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अध्याय : पंचम चिारित्र निश्चयरत्नत्रय का स्वरूप तो एसा है कि परद्रव्य से सर्वथा भिन्न अपने को समझना सम्यग्दर्शन है और अपने स्वरूप को जानना, सम्यग्ज्ञान है । अपने प्रात्मा में लीन रहना सम्याचारित्र है । यहां व्यवहार चारित्र का वर्णन कर रहे हैं।
प्रश्न :-व्यवहार चारित्र के कितने भेद हैं ? उत्तर :---दो हैं । सकल चारित्र और विकल चारित्र । प्रश्न :-चारित्र किसे कहते हैं ?
उत्तर :--हिंसा, भूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इन पांच पापों की प्रगालियों से निवृत्ति होने को चारित्र कहते हैं। इन पांच पापों का सर्वथा त्याग करना मकल चारित्र है । और पांच पापों का एकदेश त्याग करना विकल चारित्र है । यह परिग्रह माहित गृहस्थों के होते हैं । सम्यक् चारित्र की उत्पत्ति सम्यग्दर्शन और सम्यम्नान पूर्वक ही होती है । इसके बिना जो चारित्र होता है, वह मिथ्या चारित्र है। . चारित्र की उत्पत्ति का क्रम और प्रयोजन बताते हुए समंतभद्र स्वामी ने कहा है।
मोहतिमिरापहरणे, दर्शन लाभादवाप्त संज्ञान ।
रागद्वेषनिवृत्यै चरणं प्रतिपद्यते साधुः ॥३१॥रत्नक.श्रा. ___मिथ्यादर्शन रूपी अन्धकार के नष्ट हो चुकने पर सम्यग्दर्शन की प्राप्ति से जिसे सम्यग्ज्ञान प्राप्त हुना है, ऐसा साधु पुरुप राग द्वेष की निवृत्ति के लिये चारित्र - को प्राप्त होता है। मूलतः चारित्र को धारण करने का प्रयोजन ही रागद्वेष की निवृत्ति करना है । जिसने चारित्र धारगा करके भो राग द्वेष को दूर नहीं किया परमार्थ से उसे चारित्र प्राप्त ही नहीं हुवा है । ऐसा समझना चाहिये ।।
प्रश्न :--विकल चारित्र का क्या स्वरूप है ? . .
उत्तर :--अप्रत्याख्यानाबरण, क्रोध, मान, माया, लोभ का अनुदय होने से जो पांच पापों का एकदेश त्याग होता है, वह विकल चारित्र है।
प्रश्न :-विकल चारित्र के कितने भेद हैं ? उत्तर :- मूलरूप में इसके अहिंसाणुनत, सत्याणुव्रत, प्रचौर्याणुव्रत ब्रह्मचर्या
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