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अध्याय : पांचवां ]
. १. मद्य त्याग, २. मांस त्याग, ३. मधु त्याग, ४. रात्रि भोजन त्याग, । पचफली त्याग, ६. प्राप्तनुति-देवदर्शन, ७. जीव दया और ८. जल गालन । मूलगुणों का पालन करने वाला ही जैन धर्म की देशना का पात्र होता है । यही .. नहीं, गृहस्थ की संज्ञा भी इस मनुष्य को तभी प्राप्त होती है जव ब्रह पाठ मूलगुणों. ... का पालन करता है। .... प्रश्न :--पुरणवत कितने हैं और किसे कहते हैं ? ..
.. उत्तर :-तीर्थंकर देव आदि उत्तम पुरुष पाठ मूलगुणों की वृद्धि करने के .... कारण दिग्धत अनर्थदण्डवत पीर भोगोपभोग परिमाणवत को गुणव्रत कहते हैं।
दिस्वतमनर्थदण्डवतं च भोगोपभोग परिमारणम् ।
अनुवहरणाद्गुणा नामाख्यान्ति गुणवतान्यार्याः ।।५३।।
. 'गुरण: गुणवभिर्वा गर्यन्त प्राप्यन्त इत्यायः' इस. व्युत्पत्ति के अनुसार जो. गुणों अथवा गुणवान मनुप्यों के द्वारा प्राप्त किये जावें, उन्हें आर्य कहते हैं। ऐसे आर्य तीर्थंकर देब', गधर, प्रतिगणधर तथा अन्य प्राचार्य कहलाते हैं । 'गुरणाय व्रतं गुम्पन्नतम्' गुरण के लिए जो व्रत है, उन्हें गुणवत कहते हैं । उपरितन श्लोक में कहे ... गये पाठ मूलगुरणों की वृद्धि में सहायक होने से दिग्वृत, अनर्थदण्डवत और भोगोपभोग परिमाणवत इन तीन को आर्य पुरुषों ने गुणवतों में परिगणित किया है । दशों दिशाओं में माने जाने की सीमा निर्धारित करना दिग्वृत है 1 मन, वचन; काय के निष्प्रयोजन व्यापार के परित्याग को अनर्थदण्डवत कहते हैं । भोग और उपभोग की वस्तुओं का समय का नियम लेकर अथवा जीवन पर्यन्त के लिए परिमाण करना. भौगोपभोग परिमाणवत है। जो वस्तु एक बार भोगने में आती है, उसे भोग कहते है, जैसे भोजन, पेय पदार्थ तथा गन्धमाला आदि । जो बार-बार भोगने में ग्रावे उसे उपभोग कहते हैं, जैसे वस्त्र, आभूषण, यान-वाहन, शयन-शय्या आदि । इनका . परिमारा काल का नियम लेकर अथवा जीवनपर्यन्त के लिए दोनों प्रकार से होता है। विशेषार्थ :--खेत की रक्षा के लिए बाड़ी का जो स्थान है, वहीं स्थान अणुव्रतों की रक्षा के लिए तीन गुणवतों का है। यातायात की. सीमा निर्धारित होने से, निष्प्रयोजन कार्यों का परित्याग करने से तथा भोग-उपभोग की सीमा को, निश्चित ! करने से यह जीव अपने अहिंसादि अणुक्तों की रक्षा करने में समर्थ होता है, इसलिए प्राचार्यों ने इन तीनों कार्यों को गुरुण वृत में शामिल किया है । भोग और उपभोग की।
मामा
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