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________________ [ गो. प्र. चिन्तामणि Pine . ... जो परिभाषा समन्तभद्र स्वामी को अभीष्ट है; उसके अनुसार संस्कृत-टीकाकार ने उसका स्पष्टीकरगा किया है । परन्तु साथ में यह भी ज्ञातव्य है कि उमास्वामी. .. महाराज ने भोगोपभोग परिमारग के बदले उपभोग परिभोग परिमारग शब्द का प्रयोग किया है। उनके अभिप्रायानुसार उपभोग. का अर्थ है जो एक बार भोगने में ग्रावे. और परिभोग का अर्थ है जो बार-बार भोगने में प्रावे । समन्तभद्र स्वामी का उपभोग : और उमास्वामी का परिमोग एकाकि है और समन्तभद्र स्वामी का भोग और उमास्वामी का उपभोग एकार्थक है । उमास्वामी ने दिग्वृत, देशवत और अनर्थदण्डात इन तीन को गुणव्रत माना है और समन्तभद्र स्वामी ने दिदात, गर्भपात सौर गोलो परिमाणमा को गुणवत. माना है । यहाँ समन्तभद्रं स्वामी का यह अभिप्राय जान पड़ता है कि भोगोपभोग की वस्तुओं का परिमाण ... करने से परिग्रह परिभारगारण अत की वृद्धि होती है-- रक्षा होती है. इसलिए इसे गुणवत में सम्मिलितं करना चाहिए। शिक्षाप्रतों की गणना में भी दोनों प्राचायों में मतभेद है। . प्रश्न :--विग्यत किसे कहते हैं ? - उत्तर :-- मरण पर्यन्त पूक्ष्म पापों की निवृति के लिए दिशाओं के समूह को. मर्यादा सहित करके मैं इससे बाहर नहीं जाऊँगा ऐसा संकल्प करना दिग्यत होता है। दिग्वलयं परिगणितं कृत्वातोऽहं बहिन यास्यामि । इति सङ्कल्पो . दिग्वतमामृत्यणुपापविनिवृत्त्यः ॥५४॥ पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिरण, शान, ग्राग्नेय, नैऋत्य, वायब्ध, ऊर्व और , अधः इस प्रकार दश दिशाएँ होती हैं। इन सबके समूह का नाम दिग्वलय है। इन दशों दिशाओं की सीमा निश्चित कर ऐसा संकल्प करना कि मैं इनसे बाहर नहीं जाऊँगा, दिग्यत कहलाता है। दिवात मरापर्यन्त के लिए धारण किया जाता है। अर्थात् इसमें देशावकाशिक अत के समान घड़ी, - छटा अादि समय की सीमा नहीं रहती । दिग्धत का प्रयोजन सूक्ष्म पापों की निवृत्ति करना है । मर्यादा के भीतर स्थल पायों से निवृति रहती है, परन्तु भवा के बाहर यातायात सर्वथा बन्द हो जाने से यहाँ सूक्ष्म पापों को भी निवृत्ति हो जाती है। . ..विशेषार्थ :-परिग्रह स्वयं में एक बड़ा पाप है । उसी की पूर्ति के लिए यह 210
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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