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________________ ansoti अध्याय : पांचयां ] . [ १२७ मनुष्य जीवों की हिंसा करता है, झल बोलता है, चोरी करता है, स्त्री में आसक्ति रखता है तथा सर्वत्र यातायात करता है । जिसने परिग्रह सम्वन्धी अनन्त इच्छाओं का दमन कर लिया, उसने अन्य अनेक पापों में अपने आप की रक्षा स्वयं कर ली, ऐसा समझना चाहिए 1 दिन्नत में जो यातायात की सीमा निश्चित की जाती है, वह उसी परिग्रह सम्बन्धी अनन्त इच्छानों के दमन करने का एक प्रयास है। इस प्रकार दिन्नत का मुख्य उद्देश्य प्रारम्भ और लोभ को कम करने का है, अतः दिग्वत में तीर्थक्षेत्रों का. यातायात सम्मिलित नहीं। तीर्थ यात्रा या तीर्थकर भगवान की - दिव्यध्वनि ग्रादि सुनने के लिए मर्यादा के बाहर भी जाया जा सकता है। प्रश्न:-दिग्बत में मर्यादा किस प्रकार ली जाय ? उत्तर :--दशों दिशाओं के परिगरिंगत करने में प्रसिद्ध समुद्र, नदी, अरबी, पर्वत, दें और योजन को मावि कहो है : . मकराकर सरिदटवी गिरिजन पदयोजनानि मर्यादा । . प्राहुदिशां दशानां . . प्रतिसंहारे प्रसिद्धानि ॥५५॥ ___ मकराकर समुद्र को कहते हैं, सरित गंगा, सिन्धु आदि नदियों को कहते हैं, अदबी का अर्थ दगडकवन श्रादि सघन जंगल है, गिरि का अर्थ सह्य, विन्ध्य यादि . पर्वत है । जनपद का अर्थ वराट, वापी तट आदि देश है और योजन का अर्थ बीस योजन, तीस योजन आदि हैं । लोक व्यवहार में चार कोश का एक योजन लिया जाता ... है । ब्रत देने वाले और ब्रत लेने वाले को जिनका परिचय प्राप्त है, उन्हें प्रसिद्ध कहते . ... हैं। पूर्वादि दशों दिशाम्रो सम्बन्धी सीमा निश्चित करने के लिये समुद्र, नदी, जंगल, देश अथवा योजन के खम्भों आदि को मर्यादा रूप से स्वीकृत किया जाता है । . .. . विशेषार्थ :--दिग्बत. का धारक पुरुष ऐसा नियम करता है कि मैं अमुक दिशा में अमुक समुद्र तक या नमुक नदी तक या अभुक जंगल तक या अमुक देश तक या इतने बोजन तक यातायात करूगा, बाहर नहीं । ऐसा करने से उसकी इच्छाएँ अर्थात् परिग्रह सम्बन्धी अनन्त लालसा अपने याप. सीमित हो जाती हैं और जहां परिग्रह सम्बन्धी इच्छाएं कम हुई वहीं हिसादि पाप स्वयं कम हो जाते हैं । इसलिये दिग्बलय की सीमा प्रत्येक मनुष्य को करना चाहिये ! ... .......... .......... प्रश्न :--दिग्विरतिनत को धारण करने वाले पुरुषों के मर्यादा के बाहर क्या होता है ? . .... .... 288066 WEN.
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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