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________________ १२८ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि: उत्तर :--- दिग्ग्रतों को धारण करने वाले पुरुषों के अणुव्रत की की हुई मर्यादा बाहर सूक्ष्म पापों की भो निवृत्ति हो जाने से पाँच महात्रत रूप परिणति प्राप्त होती हैं । ... हिरा जतिविरले वनम् । महाव्रत परिणतिमनुव्रतानि प्रपद्यन्ते ।। ५६ ।। पञ्च जो मनुष्य दशों दिशाओं में श्राने-जाने की मर्यादा कर दियतों को धारण करते हैं, उनके मर्यादा के बाहर सूक्ष्म पाप भी छूट जाते हैं, इसलिये उनके अणुव्रत महाप्रत जैसी अवस्था को प्राप्त हो जाते हैं । विशेषार्थ :- प्रणुग्रत धारण करने वाले जीवों का मर्यादा के भीतर गमनागमन जारी रहता है, इसलिये हिंसादि पापों का स्थूल रूप से ही त्याग हो पाता. है । परन्तु मर्यादा के बाहर गमनागमन बिल्कुल ही छूट जाता है, इसलिये मर्यादा के बाह्य क्षेत्र में उनके अणुव्रत महात्रतपने को प्राप्त हो जाते हैं । प्रश्न :- गुणव्रतों में महाव्रतों की परिणति कैसे है ? उत्तर :- प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ को मन्द उदय होने से अत्यन्तं मन्द अवस्था को प्राप्त हुए, यहां तक कि जिनके अस्तित्व का निर्धारण करना भी कठिन है, ऐसे चारित्र मोह के परिणाम महावृल के व्यवहार के लिये उपचरित: होते हैं - कल्पना किये जाते हैं । • प्रत्याख्यानतनुत्वान्मन्दतराश्चरण मोह परिणामाः । सत्त्वेन दुखधारा महाव्रताय प्रकल्प्यन्ते ॥५७॥ ॥ 'नामर्कदेशेन सर्वदेशी गृह्यते' नाम के एक देश से सर्वदेश का ग्रहण होता है, इस नियम से जिस प्रकार भीम पद से भीमसेन का बोध होता है । उसी प्रकार यहाँ प्रत्याख्यान शब्द से प्रत्याख्यानावरण द्रव्य क्रोध, मान, माया, लोभ का ग्रहण होता है, क्योंकि प्रत्याख्यान शब्द का अर्थ विकल्पपूर्वक हिसादि पापों का त्याग रूप संयम होता है । उस सँयम को जो प्रावृत करते हैं, अर्थात् जिनके उदय से यह जीव हिंसादि पापों का पूर्ण त्याग करने के लिए समर्थ नहीं हो पाता है, वे प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ कहलाते हैं । यह वय और भाव के भेद से दो प्रकार के होते हैं कर्म प्रवृत्ति को द्रव्य प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ कहते हैं। और उनके उदय से श्रात्मा में जो हिसादि पापों के त्याग न करने रूप भाव होते हैं,
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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