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________________ अध्याय : पांचवां ] उन्हें भाव प्रत्याख्यानावरग क्रोध, भान, माया, लोभ कहते हैं । जब गृहस्थ के इन प्रकृतियों का इतना मन्द उदय हो जाता है कि चारित्र मोह के परिणामों का अस्तित्व भी बड़ी कठिनाई से समझा जाता है, तब उनके उपचार से महावत जैसी अवस्था हो जाती है । दिग्वत के धारक जीव के मर्यादा के बाहर के क्षेत्र में हिंसादि पापों की स्थल तथा सूक्षम दोनों प्रकार की निवृत्ति हो जाती है, इसलिये उनके अणुवत्त महाव्रतपने को प्राप्त होते हैं, परमार्थ से नहीं। परमार्थ से व्यवहार तभी हो सकता है, जब उसके प्रत्याख्यानावरण काय का मन्द उदय भी दूर हो जाये। . विशेषार्थ :--मोहनीय कर्म के दर्शन मोहनीय और चारित्र.मोहनीय की अपेक्षा दो भेद हैं। उनमें दर्शन मोहनीय आत्मा के सम्यग्दर्शन गुण का घात करता है : और चारित्र मोहनीय. चारित्र गुण का घात करता है। चारित्र मोहनीय कर्म के कषाय बंदनीय और अकषाय वेदनीय की अपेक्षा दो भेद है। इसमें कषाय वेदनीय के अनन्तानुवन्धी, अप्रत्याख्यानावरा, प्रत्याख्यानावर और संज्वलन, कोध, मान, माया, लोभ के भेद मे ४४४ - १६ भेद होते हैं। और हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्री, पुरुष, नासक वेद की अपेक्षा अकाय वेदनीय के नौ भेद हैं । अनन्तानबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ आत्मा के सम्यक्त्व गुण को घातते हैं । यद्यपि ये चारित्र मोह की प्रकृतियाँ है, तथापि इनका उदय रहते हुए सम्यवत्व गुण प्रकट नहीं हो पाता, इसलिये इन्हें पागम में सम्यग्दर्शन का घातक कहा गया है । अप्रत्याख्याना : 'बरगा क्रोध, मान, माया, लोभ, एवदेश चारित्र को धातने हैं अर्थात् इनका उदय . . . रहते हुए श्रावक के अतरूप देशचारित्र प्रकट नहीं हो सकता । प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ, सकल चारित्र को धातते हैं, अर्थात् इनवा उदय रहते हुए . . मुनि के अतरूप सकल चारित्र प्रकट नहीं हो सकता और संज्वलन क्रोध, मान, माया, - लोभ, यथास्यात चारित्र को घातले हैं, अर्थात् इनका उदय रहते हुए पूर्ण वीतराग रूप यथाख्यातः चारित्र प्रकट नहीं हो पाता । इन अंन्तानुबन्धी प्रादि चारों कषायों की तीव्रतर, तीन, मन्द और मन्दतर के भेद से चार-चार प्रकार की अनुभाग दशा होती है । अनन्तानुबन्धी प्रादि प्रकृतियों के तीतर आदि अवस्थाओं का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि अनन्तानुबन्धी के उदय से सहित एक जीव निर्गन्थं साधु का घात करने के लिए प्रवृत होता है और एक स्वयं निर्ग्रन्थ साधु वनकर अट्ठाइस मूलगुरगों का पालन करता हुआ कोलू में पेल देने पर भी संबलेश का अनुभय नहीं करता। 1 ANNE K
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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