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[ गो. प्र. चिन्तामगि
एक जीव अनन्तानुबन्धी के उदय काल में सातवें नरक की तैतीस सागर की आयु का बन्ध करता है और एक जीव अनन्तानुबन्धी के उदय काल में नौवें ग्रेवेयक के अहमिन्द्र की इकतीस सागर की आयु का बन्ध करता है । यद्यपि अन्तानुबन्धी यादि कपायों के मन्दोदय के काल में इस जीव की अणुप्रत या महाव्रताचरण रूप परिणति
हो जाती है, परन्तु करगानुयोग उसे अणुनताचरण या महावताचरण रूप से स्वीकृत ... नहीं करता । वह तभी स्वीकृत करता है, जब कि प्रतिपक्षी कषाय का अनुदय हो जाता
है । यहां प्रकरण यह है कि दिग्यत के धारक जीव के अणुअत मर्यादा के बाद क्षेत्र में महावत जैसी परिणति को क्यों प्राप्त होते हैं ? उत्तर यह दिया गया है. कि .. प्रत्याख्यानावरण शोध, मात, माया, लोभ को अत्यन्त मन्द. उदय रहने से उसके .. उपचार से महाप्रत जैसा व्यवहार होता है, परमार्थ से नहीं। ........
प्रश्न :--उपचार का महावत, साक्षात महावत क्यों नहीं होता? :
उत्तर :--हिंसा प्रादिक पांच पापों का मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदना से त्याग करना प्रमत्त विरत-पादि गुरगस्थानवी महापुरुषों का महावन होता है।
पञ्चानां पापानां हिसादोनां मनोयचः कार्यः । कृतकारितानुमोदैस्त्यागस्तु महावतं महत्ताम् ।।५।।
पाप बन्ध में कारगाभुत हिमा, असत्य, चोरी, अबम और परिग्रह इन पांच पापों का कृत, कारिल, अनुमोदना और मन, वचन, काय इन नौ कोटियों से त्याग करना महावत कहलाता है । यह महाव्रत प्रमत्त संयतादि गुगास्थानवर्ती मुनियों के ही
होता है, अन्य के नहीं। . . ... विशेषार्थ :--'महन्च तत् प्रतञ्चेति महावतम्'--. इस विग्रह के अनुसार जो. - स्वयं महान् है-उत्कृष्ट हैं, उन्हें महाउत कहते हैं । संसार के अधिकांश प्राणियों की.
प्रवृत्ति हिसादि पार पापों में हो रही है और उसके कारण वे पाप कर्मों का यन्ध कर . इसी संसार में भ्रमण करते रहते हैं । कुछ ही प्राणी इन हिसादि कार्यों को पाप समझ
कर उनका परित्याग करते हैं । त्याग करने वाले पुरुषों को आचार्यों ने 'महान' संज्ञा दी है तथा उनके इस कार्य को महाअत' नाम दिया है । जो पाप स्वयं किया जाता है, . उसे कृत कहते है । जो दूसरों से कराया जाता है, उसे कारित कहते हैं और किसी के