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है. अध्याय : पांचवां ]
करने पर जिसकी प्रशंसा की जाती है, इसे अनुमोदित कहते हैं । ये तीन कार्य मन से, बबन में, काय से होते हैं। इसलिए सब मिलाकर ३.x३ - १ कोटियों से होते हैं ! यह .. महायत १. अहिंसा महावत, २. सत्य महावत. ३. प्राचार्य महावत, ४ वह्मचर्य महावत
और परिग्रह त्याग महावत के भेद से पाँच प्रकार का होता है । इसका प्रारम्भ प्रमत्तसंयल नामक छठवें गुणस्थान से ही होता है। इसके पूर्व पञ्चम गुणस्थानयती जीन का दत अंगुवृत कहलाता है। इसके पूर्ववर्ती बार गुणस्थान वर्ती जीव भवती कहलाते हैं । अर्थात् उनमें कोई वत नहीं होता । यद्यपि अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावर पाय का मन्द उदय होने से किन्हीं जीवों के ग्राणुवेतों और महावतों का. अाचरण होने लगता है, पर करमानुयोग उन्हें अणुबूत और महाव्रत नहीं मानता ।
मान : विमात ने अतिसार कौन हैं ? ..
उत्तर :--अज्ञान अथवा. प्रमाद से ऊपर, नीचे और तिर्यक् अर्थात् समान धरातल की सीमा का उल्लंघन करना, क्षेत्र का बढा' लेना और की हुई सीमाओं का भूल जाना ये पांच दिग्विरति दूत के अतिचार माने जाते हैं।
ऊर्ध्वधस्तात्तिर्यग्व्यतिपाताः क्षेत्र वृद्धिखधीनाम् । विस्मरणं दिग्विरत्याशाः पञ्च मन्यन्ते ॥५६॥
ऊपर पर्वत आदि पर चढ़ते समय, नीचे कुभा, बावड़ी या खान आदि में उतरते समय और तिर्यग् अर्थात् धरातल पर चलते समय प्रमाद अथवा अजान के कारण सीमा का उल्लङ्घन करना, · प्रमाव और अज्ञान से किसी दिशा का क्षेत्र बढा लेना और वृत लेते समय दशों दिशाओं में आने-जाने की जो सीमायें निश्चित की थी, उन्हें भूल जाना ये पांच दिग्विरति वृत के अतिचार माने जाते हैं।
विशेषार्थ :- जैसे किसी ने नियम किया कि मैं दस हजार फुट तक ऊपर जाऊँगा, परन्तु किसी पर्वत पर चढ़ते समय या वायुयान से यात्रा करते समय इस नियम का ध्यान नहीं रखा और की हई मर्यादा से अधिक ऊँचाई तक चला गया, यह ऊर्ध्वव्यतिपात नाम का अतिचार है। इसी तरह किसो ने नियम किया कि मैं इतने फुट तक नीचे जाऊँगा, परन्तु कुमां या खान आदि में उतरते समय उस नियम का ध्यान नहीं गयखा, यह अंवस्ताद् व्यतिपात नाम का अतिचार है । यही बात समान - धरातल पर की हुई सीमा के विषय में समझना चाहिये । क्षेत्र वृद्धि का अर्थ यह है
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