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[ गो. प्र. चिन्तामणि
कि जैसे किमी ने चारों दिशाओं में पचास-पचास कोश तक जाने का नियम किया; परन्तु नियम करने वाद पूर्व दिशा में ५० कोश को दूरी पर अच्छा कारखाना खुल गया वहां से माल लाने में अधिक लाभ होने लगा और पश्चिम दिशा में ऐसा कोई. कारखानां नहीं, अतः नियम लेने वाला पूर्व दिशा की सीमा ६० कोण कर लेता है और पश्चिम दिशा की सीमा घटा कर ४० कोश कर लेता है । यहाँ क्षेत्रफल की अपेक्षा तो प्रतिज्ञा का पालन हुआ, परन्तु प्रतिज्ञा करने का मूल उद्देश्य जो प्रारम्भ और लोभ कम करने का था उसका भङ्ग हो गया । अतः भंगाभंग की अपेक्षा प्रतिचार माना गया है । सीमा के विस्मरण का अभिप्राय ऐसा है, जैसे- किसी ने नियम लिया है कि मैं अमुक दिशा में ४० कोश तक जाऊँगा, पीछे वह नियम भूल कर कहने लंगा कि मैंने नियम ४० कोश तक का लिया था या ५० कोश तक का ऐसी दुविधाकी स्थिति में ४० कोश से आगे जाने में यह प्रतिचार होता है । इसी को तत्त्वार्थ सूत्रकार ने स्मृत्यन्तराधान कहा है, अर्थात् की हुई स्मृति के बदले दूसरी स्मृति का
धारण करना ।
प्रश्न :- - द्वितीयगुणव्रतों में अनर्थदंड का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :--- बूत धारण करने वाले सुनियों में प्रधान तीर्थंकरदेवादि दिग्वृत की सीमा के भीतर प्रयोजन रहित पाप सहित योगों से निवृत्त होने को ग्रनर्थदण्डबूत जानते हैं ।
अभ्यन्तरं दिगवधेरपार्थकेभ्यः सपापयोगेभ्यः ।
विमर्थ दण्डवतं विदुर्व्रत धराग्रण्यः ॥ ६०॥
व्रतचर का अर्थ पञ्च महावृतों को धारण करने वाला मुनि होता है । उन मुनियों में जो अग्रणी प्रधान हैं, वे वृतघरायसी कहलाते हैं । इस तरह मुनियों में प्रधान तीर्थंकर देव ग्रादि ने अनर्थदण्डवृत का लक्ष इस प्रकार कहा हैं कि दिग्विरतिवृत की मर्यादा के भीतर प्रयोजन रहित पाप पूरा मन, बचन, काय के व्यापार रूप योगों से निवृत होना अनर्थदण्डत है । दिग्वृत में मर्यादा के बाहर होने वाले पापपूर्ण निरर्थक कार्यों से निवृत्ति होती है और अनर्थदण्डवत में दिग्वत की सीमा के भीतर होने वाले पाप पूर्ण निरर्थक कार्यों से निवृत्ति होती है। यह इन दोनों में अन्तर है ।
विशेषार्थ :
'श्रपगतः श्रर्थः प्रयोजनं येषां ते अपार्थकारतेभ्य:' इस समास के