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अध्याय पांचवा ]
कहते हैं।
अनुसार जिनका कुछ भी प्रयोजन नहीं है, उन्हें प्रवृत्तिर्दण्डः योगों की प्रवृत्ति को दण्ड कहते हैं अर्थात् मन से विचार करना वचन से उपदेश देना और शरीर से कुछ कार्य करना दण्ड कहलाता है । यह दण्ड जब पाप से युक्त होता है, तब अपराध कहलाता है। जैसे किसी के विषय में खोटा चिन्तन करना, पाप कर्मो का उपदेश देना तथा प्रमाद पूर्वक शरीर से प्रवृत्ति करना श्रादि, जिन कयों से अपना कुछ भी प्रयोजन नहीं है, ऐसे कार्यों से दूर रहना अनर्थदण्डवत नाम का दूसरा गुणवृत कहलाता है ।
प्रश्न : ---- अनर्थदंड क्या है ?
उत्तर :- गणधर देवादिक पापोपदेश, हिंसादात, अपध्यान, दुःश्रुति और इन पांच को अनर्थदण्ड कहते हैं ।
पापोपदेश हिंसा दानापध्यान दुश्रुतीः प्राहुः प्रमाद मनर्थ दण्डान् दण्ड
मन-वचन-काय के शुभ व्यापार को दण्ड कहते हैं क्योंकि, वे दण्ड डंडे के समान दूसरों को पीड़ा करते हैं । तथोक्त दण्डों को न धारण करने वाले गणधर देव यादि ने पापोपदेश, हिसादान, ग्रपधान, दुःश्रुति और प्रमादचर्या इन पाँच को अनर्थदण्ड कहा है। इनसे निवृत्ति होना सो पाँच प्रकार का अनर्थदण्ड वृत है ।
पञ्च ।
धराः ॥ ६१ ॥
विशेषार्थ -- पाप का उपदेश देना और पाप का उपदेश सुनना ये दोनों कार्य वचन योग की दुष्प्रवृत्ति रूप है । खोटा चिन्तन करना, यह मनोयोग की दुष्प्रवृत्ति है। और हिंसा के उपकरण दूसरों को देना तथा प्रमाद पूर्वक शरीर की प्रवृत्ति करना, यह काय योग की दुष्प्रवृत्ति है। इस प्रकार तीनों योगों की दुष्प्रवृत्तिरूप पाँच कार्य होते हैं - १ पापोपदेश, २. हिंसादान, ३. अपध्यानं, ४ दुःश्रुति ५, प्रमादचर्या ये पाँच कार्य प्रर्थदण्ड हैं । इनसे व्यर्थ ही पाप का बन्ध होता है, इसलिए बूती मनुष्य इनसे निवृत होकर पाँच प्रकार के प्रनर्थदण्डवत को धारण करता है ।
प्रश्न : - पापोपदेश अनर्थ दंड का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- पशुओं को क्लेश पहुंचाने वाली क्रियाएँ, व्यापार, हिंसा, प्रारम्भ तथा ठगाई आदि की कथायों के प्रसंग उत्पन्न करना पापपदेश नाम का अर्थदण्ड स्मरण करने के योग्य हैं ।