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। गो. प्र. चिन्तामणि ... तिर्यक् क्लेश वरिराज्यहिंसारम्भ प्रलम्भनादीनाम् । .
कथा प्रसङ्गः श्सवः समर्तव्यः पाप उपदेशः ।।६२॥ .. जो उपदेश पाप के उपार्जन में कारण हो उसे पापोपदेश कहा है । तिर्यक्चलेश
नादि उसके भेद हैं । हाथी सादि को वश में करने की प्रक्रिया तिर्यकलेश है, लेन-देन यादि व्यापारियों को नारिणज्या है, प्रागिरावध करना हिंसा है, खेती अादिक प्रारम्भ है,
तथा दूसरों को किस तरह ठगना प्रादि की कला प्रलम्भन है। तिर्यश्वलेश के समान ... मनुष्यालेश भी होता है, अर्थात् ऐसी क्रियाएँ जिनसे कि मनुष्य को क्लेश होता है।
इन सबकी कथाओं का उपस्थित करना अर्थात् बार-बार इनका उपदेश देना सो पापोपदेश नामक अनर्थदण्ड है। इसका परित्याग करने से पापोपदेश अनर्थदण्डवत होता है 1
.. विशेषार्थ-कहीं-कहीं पापोपदेशा अनर्थदण्ड का ऐसा भी व्याख्यान किया। जाता है-'वले शतिर्मग्दगिज्यावधकारम्भ कादिषु पाप संयुतं वचनं पापोदेशः अर्थात् क्लेश वरिषज्या, तिर्यम्बगिाज्या, व कोपदेश और प्रारम्भकोपदेश इस प्रकार के
पाप संयुक्त जो वचन है, उन्हें. पापोपदेश कहते हैं । इस देश में दाम और दासियाँ ... सुलभ हैं। उन्हें अमुक देश में ले जाकर बेचने में अधिक लाभ होता है ऐसा उपदेया
देता क्लेशवगिज्या है । गाय, भैंस आदि को अमुक देश में खरीदकर अमुक देश में ले जाकर बेचने में अधिक लाभ होता है. ऐसा उपदेश तिर्यग्बगिज्या है । वागुरिकभृगादिक को पकड़ने के लिए जाल फैलाने वाले; शौकरिक सनर आदि का शिकार करने वाले और शाकृनिक-पक्षियों को मारने वाले लोगों को यह उपदेश देना कि. अमुक स्थान पर मृग, शूकर तथा पक्षी आदिक 'अधिक हैं बधकोपदेश है। और किसान आदि प्रारम्भ कामों को पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा वनस्पति का प्रारम्भ इस उपाय से करना चाहिये, ऐसा उपदेश देना प्रारम्भकोपदेश है, इस श्लोक का उत्तरार्थ 'ध' प्रति में इस प्रकार है, 'प्रलवः कथा प्रसंग: पाप उपदेश:' इस पाठ में शलोक का अर्थ इस प्रकार होला है-तिर्ययमलेश आदि को उत्पन्न करने वाली कथानों । का जो प्रसंग है, उसे पापोपदेश जानना चाहिये । संस्कृत टीका के द्वारा भी इस पाठ का समर्थन होता है।
प्रश्न :---हिसादान क्या है ? उत्तर :----गणवरदेवादिक विज्ञपुरुष फरसा, तलवार, कुदारी, अग्नि, शस्त्र,