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अध्याय पाचवां |
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far तथा सांकल ग्रादिक हिंसा के कारणों के दान को हिंसादान नाम का अर्थदण्ड कहते हैं ।
परशु कृपाणखनिज्वलना युध श्रङ्गिः
खलादीनाम् ।
दहेतुनां दानं हिंसादानं ब्रुवन्ति बुधाः ॥६३॥ | फरसा तथा कुल्हाड़ी यादि को परशु कहते हैं। • जमीन खोदने के साधन ती कुदारी, फावड़ा यादि को ज्वलन कहते हैं, छुरी, लाठी, भाला आदि को प्रायु शृी कहते हैं। और बन्धन के साधन को कारण हैं । इनका दूसरों के लिये देना सो हिसादान अर्थदण्ड है । इनका त्याग करना हिंसादानन्यनर्थदण्ड ग्रत है।
तलवार को कृपाण कहते हैं, खनित्र कहते हैं । अनि को कहते हैं. विष सामान्य को कहते हैं | ये सब हिसा के
विशेषार्थ -- यद्यपि व्रती मनुष्य स्वयं के उपयोग के लिये परशु तलवार तथा गेंती, फावड़ा यादि हिंसा के उपकरणों को रखता है और सावधानी के साथ • उनका उपयोग करता है । परन्तु वह दूसरों के लिये मांगने पर नहीं देता, क्योंकि वह दुरुपयोग नहीं करेगा, इसका विश्वास नहीं है। यदि कोई परदेशी मनुष्य भोजन बनाने. . के लिये अग्नि मांगता है, तो उसके लिये अग्नि देना इस अनर्थदण्ड में नहीं आता है । प्रश्न :- ग्रपध्यान का स्वरूप क्या है ?
उत्तर :
बन्धन
- जिनागम में निपुण पुरुष, द्वेष के कारण किसी के वन, और छेद यादि का तथा राग के कारण परस्त्री यादि का चिन्तन करने को अपध्यान कहते हैं ।
वध
बन्धच्छेदादेव षात्रागाच्च परकलत्रादेः । ध्यानमध्यानं शासति जिनशासने विशदाः || ६४ || द्वेष के कारण किसी के मर जाने, बँध जाने जाने आदि का और राग के कारण परस्त्री ग्रादि का अपध्यान नामक अर्थदण्ड है, ऐसा जिनशासन के ज्ञाता पुरुष कहते हैं ।
विशेषार्थी— ( श्रपकृष्ट ध्यानम् अध्यानम् ) इस व्युत्पत्ति के अनुसार अपध्यान का अर्थ खोटा ध्यान होता है । खोटा व्यान राग द्वेष के कारण होता है । राग के वशीभूत होकर परस्त्री यादि का ध्यान होता है और द्वेष के कारण किसी के
rear गोपाङ्ग के छिद ध्यान- बार-बार चिन्तन सो