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[ गो. प्र. चिन्तामगिः
मर जाने, बँध जाने अथवा छिद जाने आदि का विचार होता है। यह सब अपध्यान है-मनोयोग की दुष्प्रवृत्ति है । किसी की हार-जीत का विचार भी इसी अपध्यान में ग्राता है । इसे पाप बन्ध का कारण जानकर व्रती मनुष्य इससे दूर रहता है । यह अपध्यान-अनर्शदण्डवत है ।।
प्रश्न :--दुश्र तिका का क्या स्वरूप है ? -
उत्तर --प्रारम्भ, परिग्रह, साहस, मिथ्यात्व, द्वेष, राग, अंहकार और काम के द्वारा चित्त को कलुषित करने वाले शास्त्रों का सुनना दुश्रुति नाम का अनर्थ
दण्ड है।
प्रारम्भसङ्ग साहस मिथ्यात्व हुष राग मदभवनैः ।। चेतः कलुषयतां श्रु तिरवधीनों दुःशुति भवति ।।६५॥
खेती आदि को प्रारम्भ कहते हैं, और परिग्रह को संग. कहते हैं। इन दोनों का वर्णन जातानीति में किया गया है, क्योंकि. 'कृषिः पशुपाल्यं वाणिज्यं च वार्ता इत्यभिधानात्' अर्थात् खेती, पशुपालन और व्यापार यह सब बार्ता है, यह कहा गया है । अर्थशास्त्र को वार्ता कहते हैं । साहस का अर्थ अत्यन्त याश्चर्य जनक कार्य है । इसका वर्णन वीर मनुष्यों की कथा में किया जाता हैं । अद्वैतवाद तथा अणिकवाद मिथ्यात्व है । इसका वर्णन प्रमाण विरुद्ध अर्थ के प्रतिपादक शास्त्र के । द्वारा किया जाता है । द्वेष का अर्थ प्रसिद्ध है। यह द्वेष विद्वेषीकरणा-द्वेष उत्पन्न करने वाले शास्त्र के द्वारा कहा जाता है। वणीकरण आदि शास्त्र के द्वारा राग उत्पन्न । किया जाता है, मद अहंकार को कहते हैं। इसकी उत्पत्ति . 'वर्णानां ब्राह्मणो गुरु वर्गों का ब्राह्मण गुरु है, इत्यादि ग्रन्थों से जानी जाती है। मदन का अर्थ काम है। यह रतिगुगा बिलास पताका आदि शास्त्रों से उत्कृष्ट होता है । इस प्रकार प्रारम्भ प्रादि के द्वारा चित्त को कलुषित करने वाले शास्त्रों का श्रवरणं करना दुःश्रुति नारक अनर्थदण्ड है.। इसका त्याग करना दुःश्रुति अनर्थदण्डवत है । . : ..
विशेषार्थ----जो शास्त्र प्रारम्भ, परिगह, अद्भुत कार्य, मिथ्यात्व, द्वेष राग, . अहंकार और काम की उत्कटता से चित्त को कलुपित करते हैं, उन्हें दुःश्रुति कहते हैं ।
इनके सुनने का त्याग करना दुःश्रुति नामक अनर्थदगडात है। व्रती मनुष्य सदा ऐसे . ही शास्त्रों का स्वाध्याय करता है, जिससे उसे अपने सर्वज्ञ-बीतसंग स्वरूप की नाही