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आदि को वृद्धि होती
अध्याय : पांचवां ]
दृढ़ हो जाये । इसके विपरीत जिन शास्त्री के सुनने से
है, वे सब कुशास्त्र हैं, बती मनुष्यों को इन सब का त्याग करना चाहिये । प्रश्न :- प्रसादचर्या का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- निष्प्रयोजन पृथ्वी, पानी, अग्नि और वायु का आरम्भ करना वनस्पति का छेदना, स्वयं घूमना श्रीर दूसरों को घुमाना इन सबको प्रमादचर्या नाम का अर्थदण्ड कहते हैं ।
क्षितिसलिल दहनपवनारम्भं विफलं वनस्पतिच्छेदम् ।
सरणं सरणमपि च प्रमादचर्या प्रभाषन्ते ||६६||
व्यर्थ ही पृथ्वी को खोदना, पानी को बिखेरना, ग्रग्नि को जलाना; वायु को रोकना, फल फूल पत्ती आदि को तोड़ना, स्वयं निष्प्रयोजन घूमना और दूसरों को भी निष्प्रयोजन घुमाना यह सब प्रमादचर्या नामक अर्थदण्ड है। इससे निवृत्त होने को प्रमादत्रय अर्थदण्डव्रत कहते हैं ।
विशेषार्थ - कितने ही लोग पृथ्वी को निष्प्रयोजन खोदने लगते हैं, पानी . सींचने लगते हैं अथवा तालाब, नदी में घंटों तैरते रहते हैं, अग्नि को प्रज्वलित करते हैं, पंखा यदि चलाकर वायुकायिक जीवों को त्रास देते हैं, अथवा सिरहाने या गद्दा आदि में हवा भर कर उस पर शयन करते हैं, अनावश्यक फूल - फल, पत्ती आदि को तोड़कर वनस्पतिकायिक जीवों का घात करते हैं, स्वयं निष्प्रयोजन घूमते हैं। और दूसरों को भी निष्प्रयोजन घूमने के लिये प्रेरणा करते हैं । उनका यह सब कार्य . प्रमादचर्या अर्थदण्ड में याता है। यह ठीक है, कि अशुधत के वारक मनुष्य को स्थावर हिंसा का त्याग नहीं है । परन्तु अनावश्यक स्थावर हिंसा मुझसे न हो जाये, इस बात का ध्यान उसे रखना आवश्यक है । प्रमादात् चर्या प्रमादचर्चा इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रमादपूर्वक जितनी प्रवृत्ति है, वह सब प्रमादच अर्थदण्ड में गर्भित है । वृती मनुष्य इनका त्याग कर प्रसादचर्या अनर्थदण्डवत को धारण करता है ।
प्रश्न :- अनर्थ दंड विरती व्रत के पांच प्रतिचारों का क्या स्वरूप ? उत्तर :- राम की तीव्रता से हास-परिहास में भद्दे वचन बोलना शरीर की " कुचेष्टा करना बकवाद करना भोगपभोग की सामग्री का अधिक संग्रह करना और प्रयोजन का विचार किये बिना ही किसी कार्य का अधिक आरम्भ करना वे पांच दण्डविरति वृत के अतिचार हैं ।