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[ गो. प्र. चिन्तामणि कन्दर्प कौत्कुच्यं मौखर्यमति प्रसाधनं पञ्च । असमीक्ष्य चाधिकरणं व्यतीतयोऽनर्थदण्डकृद्विरतेः ।।
यद्यपि कोष में कंदर्प का अर्थ काम है, परन्तु यहां काम को उत्तेजित करने वाले भद्दे वचन बोलना कंदर्प माना गया है। भ बचन बोलते हुए हाथ आदि अंगों में शरीर की कुचेष्टा करना कौत्कुच्य कहलाता है । अावश्यकता से अधिक निष्प्रयोजन बहुत बोलना मौर्य कहलाता है। जितने पदार्थ से अपने उपभोग और परिभोग की पूर्ति होती है, उससे अधिक का संग्रह करना अति प्रसाधन कहलाता है,
तथा असमीक्ष्य-प्रयोजन का विचार किये बिना ही अधिक कार्य का करना असमीक्ष्या. धिकरण है । ये पांच अनर्थदण्डविरति वृत के अतिचार हैं। -
विशेषार्थ हमजोली चार मित्र इकटु बैठने पर हंसी-मजाक करते हए भ-भ बचन बोलकर अपनी वर्गणा का दुरुपयोग करता है। साथ ही संभोगादि का . संकेत करते हुए शरीर की भट्टी चेष्टा करते हैं । मित्र गोष्ठी में बैठकर घपटों गपशप:
करते रहते हैं। स्नानादि के लिये तालाब या नदी यादि को जाते समय तेल अादि शृङ्गगार सामग्री इतनी अधिक ले जाते हैं, जो अपनी प्रावश्यकता से अधिक होती है, तथा दूसरे लोग उसका उपयोग कर जीव घात करते हैं। कितने ही लोग अपना खुद का प्रयोजन थोड़ा होने पर भी प्रारम्भकर्ताओं से अधिक आरम्भ कराते हैं। उनके यह सब काम गृहीत व्रत को मलिन करने के कारण अतिचार माने गये हैं । उमा स्वामी महाराज के उपभोग-परिमोगानविय के स्थान पर संमन्तभद्र स्वामी ने अतिप्रसाधन शब्द का प्रयोग किया हैं । परन्तु यह शब्दभेद: ही है, अर्थभेद नहीं ।
प्रश्न :--भोगोपभोग परिमारण नामक व्रत का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :--विषयों के परिमाण के भीतर विषय सम्बन्धी राग से होने वाली प्रासक्तियों को कृश करने के लिए प्रयोजनभूत भो इन्द्रिय विषयों का परिगणमन करना-सीमा निर्धारित करना भोगपभोग परिमारा नाम का गुगावत है ।
अक्षार्थानां परिसख्यानं भोगोपभोग परिमाणम् । अर्थवतामध्यवधी रागरतीनां तनु कृतये ॥६७।।
परिग्रह परिमाणवत की जो सीमा निर्धारित की थी, उसके भीतर विषय सम्बन्धी राग के तींब उदय से होने वाली प्रासक्तियों को अत्यन्त कृश करने के लिये