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अध्याय : पांचवां ]
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"fare प्रयोजन को सिद्ध करने वाले भी इन्द्रिय सम्बन्धी विषयों का जो परिसंख्यान' नियम किया जाता है, वह भोगोपभोग परिमाण नाम का सुबूत है टीकाकार ने 'अर्थवतामपि' शब्द का एक अर्थ यह किया है कि अर्थ परिग्रहरहित मुनि इन्द्रियों का परिणमन करते ही हैं, परन्तु ग्रर्थवान् परिग्रह सहित गृहस्थ भी इन्द्रिय विषयों का जो परिगमन करते हैं, वह भोगोपभोग परिमाणवूत कहलाता है ।
विशेषार्थ- परिग्रह परिमाणबूत में भोग और उपभोग की वस्तुओंों की जो संख्या निश्चित की जाती है, उनका प्रतिदिन उपभोग नहीं होता, इसलिये उस सीमा को और भी संकुचित करने के लिये भोगपभोग परिमाण वृत धारण किया जाता है।
नाद पांच इन्द्रियों के विषय भूत जो पदार्थ हैं, वे संक्षेप में भोग-उपभोग नाम से व्यवहृत होते हैं । विषय सम्बन्धी रोग की तीता से विषयों में जो प्रासक्तियाँ बढ़ती रहती हैं, उन्हें कम करने के लिये वृती मनुष्य इन्द्रिय विषयों की सीमा को और भी संकुचित करता है । भोग और उपभोग में जो अभक्ष्य प्रथवा ग्रनुपसेव्य पदार्थ हैं, उनका तो जीवन पर्यन्त के लिये त्याग होता है और जो भक्ष्य तथा उपसेव्य हैं, उनका जीवन पर्यन्त के लिये अथवा कुछ काल के लिये भी परिगणन किया जाता है । अभक्ष्य के पांच प्रकार हैं- १. नसघात र प्रमाद, ३. बहुवात, अनिष्ट और ५. अनुपसेच्य । जो मनुष्य त्रसहिंसा का त्याग करना चाहता है, उसे मधु और मांस का त्याग करना चाहिये, क्योंकि उस की उत्पत्ति वास घात के बिना नहीं होती । जो सघात के साथ प्रमाद का परित्याग करना चाहते हैं, उन्हें मद्य का त्याग करना चाहिये, क्योंकि उसके सेवन से त्रसघात और प्रमाद दोनों उत्पन्न होते हैं। अदरक, मूली, हल्दी आदि के सेवन में बहुधात होता है । अनिष्ट तथा अनुपसेव्य पदार्थों का • सेवन भी संक्लेश का कारण होता है, अतः व्रती मनुष्य इनसे दूर ही रहता है । इसके अतिरिक्त भक्ष्य और उपसेव्य पदार्थों के विषय में भी नियम किया जाता है कि श्राज " इतने ग्रत इतने रस और इतने सचित्त पदार्थों का सेवन करूँगा । इतने वस्त्र, इतने आभूषण तथा इतने शयन श्रासन, वाहन आदि ग्रहणं करूंगा। इस व्रत का उद्देश्य fare raat राग को कम करता है ।
प्रश्न : भोग और उपभोग क्या हैं ?
उत्तर : -- भोजन और वस्त्र को आदि लेकर पञ्चन्द्रियों सम्बन्धी जो विषय