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[ गो: प्र. चिन्तामणि
भोगकर छोड़ देने के योग्य है, भोग है और जो भोगकर फिर से भोगने योग्य, वह उपभोग हैं।
मुक्त्या परिहालयो को भुरका युद्धश्च भोक्तव्यः । उपभोगोऽशन बसन प्रभृतिः पाञ्चेन्द्रियो विषयः ॥६॥
जो पदार्थ एक बार भोग कर छोड़ दिये जाते हैं, फिर से काम में नहीं आते ऐसे भोजन, पुष्प, गन्ध तथा विलेपन आदि पदार्थ भोग कहलाते हैं, जो पहले भोगकर फिर से भोगने में आते हैं, ऐसे वस्त्र, आभूषण आदि उपभोग कहलाते हैं । इनकी सीमा निश्चित करना सो भोगोपभोग परिमाण वृत है।
विशेषार्थ :----'भुज्यते सकृत सेव्यते इति भोगः' जो एक बार सेवन में पाने, सो भोग है और. 'उपभुज्यते भूयो भूयः सेव्यते' जो अनेक बार सेवन में प्रावे, वह उपभोग है । . जैसे भोजन और वस्त्र प्रादि । भोजनादि भोग का दृष्टान्त है और यसनादि उपभोग का।।
प्रश्न :-वृती को छोड़ने योग्य पदार्थ कार से हैं ? . उत्तर :-जिनेन्द्र भगवान के चरणों की शरण को प्राप्त हुए पुरुषों के द्वारा स जीवों को हिंसा का परिहार करने के लिए मधु और मांस और प्रमाद का परिहार करने के लिए मदिरा छोड़ने के योग्य हैं।
त्रस हति परिहरणार्थं क्षौद्र पिशितं प्रमादपरिहृतये । सद्य च धर्जनीयं जिन चरणौ . शरणमुपयातः ।।६।।
जो जिनेन्द्र देव के चरणों की शरण को प्राप्त हैं अर्थात जैन धर्म धारक हैं : ऐसे श्रावकों को द्वीन्द्रियादिक बस जीवों की हिंसा से बचने के लिए मधु और मांस कर का त्याग करना चाहिए तथा प्रमाद से बचने के लिए मदिरा त्याग करना चाहिए । 'यह माला है अथवा स्त्री है. इस प्रकार के विवेक के अभाव को प्रमाद कहते हैं । . विशेषार्थ :----जैन धर्म धारण करने का प्रारम्भिक नियम है कि मद्य, मास
और मधु का त्याग किया जाये। इसके बिना जैन धर्म का धारण नहीं हो सकता । क्षुद्रा, मधुमक्षिका को कहते हैं । अतः 'क्षुद्राभिः नियंतयः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार मधु-भक्षिकाओं के द्वारा रचा हा पदार्थ क्षौद्र या मधु कहलाता है । इसमें अनन्त अस जोब उत्पन्न होते रहते हैं। और पिशित-मांस द्वीन्द्रियादिक जीवों का कलेवर है । इसकी भी कच्ची तथा पक्की दोनों - अवस्थाओं में अनन्त बस जीव उत्पन्न होते है
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