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________________ . HERECER अध्याय : पांचवां ] बिन्दुहोनं कलाहीनं रेफद्विलयजितम् । । अनक्षर त्वमापन्न मनुच्चार्य च चिन्तयेत् ।।४७८।। तत्पश्चात् इस मंत्रराज का बिन्दु (अनुस्वार) रहित, कला (अर्द्ध चन्द्राकार) रहित, दोनों रेफ (र) रहित, अक्षर रहितता को प्राप्त, तथा उच्चार करने योग्य . न हो ऐसा क्रम में चितवन' करे। .... चन्द्रलेखास सूक्ष्म स्फुरन्तं भानु भास्वरम् । अनाहताभिधं देवं दिव्यरूपं विचिन्तयेत् ॥४७६।। चन्द्रमा की रेखा समान सूक्ष्म और सूर्य सरीखा देदीप्यमान, स्फुराअमान होता हुग्रा तथा दिव्य रूप का धारक ऐसा जो अनाहत नाम का देव है, उसका चिन्तवन करें। अस्मिंस्थिरी कृताभ्यासाः सन्तः शान्ति समाश्रिताः। अनेन दिव्य पोतेन तीवा जन्मोग्र सागरम् ॥४८०॥ इस अनाहत नामा देव में किया है स्थिर अभ्यास जिन्होंने, ऐसे सत्पुरुष इस दिव्य जहाज के इस संसार रूप धोर समुद्र को तिर कर, शान्ति को प्राप्त हो S इस चितवन का अन्य प्रकार----- तदेव च पुनः सूक्ष्म क्रमाद्वालाग्रसन्निभम् । ध्याये देकानतां प्राप्य कत्तुं चेतः सुनिश्चलम् ॥४८१॥ और फिर एकाग्रता को प्राप्त होकर, चित्त को स्थिर (निश्चल) करने के लिए उस ही अनाहत को अनुक्रम से सूक्ष्म ध्याता हुआ बाल के अग्रभाग समान न्यावें। . ततोऽपि गलिता शेष विषयीकल मानसः । अध्यक्ष मीक्षते साक्षाज्जगज्ज्योतिर्मयं क्षणे ।।४८२॥ उसके पश्चात् गलित हो गये हैं समस्त विषय जिसमें, ऐसे अपने मन को स्थिर करने वाला योगी क्षण में ज्योतिर्मय साक्षात् जगत को प्रत्यक्ष अवलोकन ... करता है। सिद्धयन्ति सिद्धयः सर्वा अणिमाद्या न संशयः । सेवां कुर्वन्ति दैत्याधा प्राजेश्वयं च जायते ॥४८३॥ ..
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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