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[ गो. प्र. चिन्तामणि छेदता हुश्रा, मुसार के भ्रम को दूर करता हुआ तथा परमस्थान (मोक्षस्थान) को प्राप्त करता हुआ, मोक्ष लक्ष्मी से मिलाप कराता हुआ ध्यायें।."
अनन्यशरणः साक्षात्तत्सली नकमानसः ।
तथा स्मरत्यसो ध्यानी यथा. स्वप्नेऽपि न स्खलेत् ॥४७३।। .. ध्यान करने वाला इस मन्त्राधिप को अन्य किसी की शरण न लेकर; इसमें ही साक्षात् तल्लीन मन करके स्वप्न में भी इस मंत्र से च्युत न हो एसा दृढ़ होकर ध्या।
इति मत्वा स्थिरीभूतं सर्वावस्थासु सर्वथा ।
नासाग्रे निश्चलं धत्ते यदि वा भ्र लतान्तरे ॥४७४॥
ऐसे पूर्वोक्त प्रकार से. महामन्त्र के ध्यान के विधान को जानकार मुनि समस्त अवस्थानों में स्थिर स्वरूप सवथा नासिका के अनुभाग में अथवा भौंह लता के मध्य में इसको निश्चल धारण करें।
... तत्र कैश्चिच्च वर्णादि भेदस्तकल्पितं पुनः ।
मन्त्र मण्डल मुद्रादि साधनैरिष्ट सिद्धिदम् ।।४७५।।
इस नासिका के अग्नभाग अथवा भौंह लता के मध्य में निश्चल धारण करने अवसर में कई प्राचार्यों ने उस मंत्राधिप को ध्यान करने में अक्षरादिक के भेद करके .. कल्पना की है और मंडल मुद्रा इत्यादिक साधनों से इष्ट की सिद्धि का देने वाला ___ कहा है । चित्र नं. १४ ! .:: . .
"अकारादि हकारान्तं रेफ मध्यं सबिन्दुकम् ।। तदेव परम तत्त्वं यो जानाति स तत्त्ववित् ॥४७६।।
प्रकार है आदि में जिसके, हकार है अन्त में जिसके और रेफ है मध्य में जिसके और बिन्दु सहित ऐसा जो अह पदं है, वही परम तत्व है । जो कोई इसको जानता है, वह तत्त्व को जानने वाला है ।
सर्वावयव संपूर्ण । ततोऽवयवविच्युतम् ।.
क्रमेण चिन्तयेद्धयानी वर्णमात्रं शशिप्रभम् ।।४७७॥ ...... प्रथम तो ध्यानी अहं अक्षर का पूर्वोक्त समस्त अवयवों सहित चिन्तवन ... करें, तत्पश्चात् अवयव रहित ध्यान करें, फिर कम से चन्द्रमा समान प्रभावाला
वर्णमात्र (हकार) स्वरूप चितवन करें।
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