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________________ . अध्याय : पांचवां ] [ २५६ यथार्थ में यह अक्षर क्या है ? ___मन्त्रमूति समादाय देव देवः स्वयं जिनः । सर्वज्ञः सर्वगः शान्तः सोऽयं साक्षाव्यवस्थितः ।।४६६।। । यह मन्धराज (ह) अक्षर ऐसा है कि मानो सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, शान्तभूत्ति के धारक देवाधिदेव स्वयं श्री जिनेन्द्र । भगवान् ही मन्त्रमूति को धारण करके साक्षात् . विराजमान है । भावार्थ - यह मन्त्रराज अक्षर साक्षात श्री जिनेन्द्र स्वरूप है। ज्ञानबीजं जगद्वन्ध जन्मज्वलनवायुचम् । पवित्र मतिमान्ध्यायेदिमं मन्त्र महेश्वरम् ।।४६७।। बुद्धिमान पुरुष मन्त्रराज को ज्ञान का बोज, जगत से वंदनीय तथा संसार रुपी अग्नि के लिये अर्थात् जन्म संताप को दूर करने के लिये मेघ के समान ध्यावे । सकदुच्चारितं येनं । हृदि . स्थितिम् । तर्वच जन्म सन्तान प्ररोहः प्रविशीर्यते ।।४६८॥ जिस समय यह महातत्त्व मुनि के हृदय में स्थिति करता है, उस ही काल संसार के सन्तान का अंकुर गल जाता हैं, अर्थात् टूट जाता है । इस मंत्रराज का ध्यान कैसे करें? स्फुरन्तं भूलतामध्ये विशन्तं बदनाम्बुजे । तालुरन्ध्ररण गच्छन्तं स्त्रवन्तममृताम्बुभिः ।।४६६।। स्फुरन्त नेत्र पत्रेषु कुर्वन्त मलके स्थितिम् । भ्रमन्तं ज्योतिषां चक स्पर्द्धमानं सितांशुना ॥४७०।। संचरन्तं दिशामास्ये प्रोच्छलन्तं नभस्तले । धंदयन्तं कलङ्कोचं स्फोटयन्तं भवभ्रमम् ।।४७१।। नयन्तं परमस्थानां योजयन्तं शिवश्रियम् । इति मन्त्राधिपं धीर कुम्भकेन विचिन्तयेत् ॥४७२।। धैर्य का धारक योगी कुम्भक प्राणायाम से इस मंत्रराज को भौंह की . लतानों में स्फुरायमान होता हुआ, तालुका के छिद्र से गमन करता हुमा, तथा अमृतमय जल से भरता हुग्रा, नेत्र की पलकों पर स्फुरायमान होता हुया, केशों में स्थित करता हुआ तथा ज्योतिपियों के समूह में भ्रमता हुना, चन्द्रमा के साथ स्पर्धा करता हुया, दिशाओं में संचरता हुअा, प्राकाश में उछलता हुआ कलंक के समूह को
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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