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[ गो. प्र. चिन्तामणि अनाहत सहित इसको योगीजन मन्त्रराज कहते हैं। अनाहत का. क्या स्वरूप है ?
अनाहत का लक्षण । . . उबिन्द्वाकारहरीद्धर्वरेफ विन्द्वान वाक्षरम् । मालाधः स्थन्दि पीयूषबिन्दु विदुरनाहतम् ।।४६२२॥ इसमें ६ अक्षर मिले हुए हैं।
१. उकार, २. अनुस्वार, ३, ईकार, ४. उर्द्ध रेफ, ५. हकार, ६. हकार, - ७. रेफ, ८. अनुस्वार, ६. ईकार।
देवासुरनत भीमदुर्बोध वान्त. भास्करम् । ___ ध्यायेन्मूद्धस्थ चन्द्रांशुकला पाकान्त दिङ मुखम् ।।४६३॥
देव और असुर कर रहे हैं। नमस्कार जिसको ऐसे, प्रज्ञानरूपी अन्धकार को दूर करने के लिये सूर्य के समान तथा मस्तक पर स्थित जो चन्द्रमा उसकी किरणों के समूह से व्याप्त किया है, दिशाओं का मुख (कादि) भाग जिसने ऐसे इस मन्त्रराज का ध्यान करे । इस अनाहत मंत्रराज का कैसा ध्यान करे ?
कनक कमल गर्ने कणिकायां निषण्णं, विगतमलकलङ्क सान्द्रांशुगौरम् । गगनमनुसरन्तं , सञ्चरन्तं हरित्सु,
स्मर जिनवरकल्प मन्त्रराज यतीन्द्र ॥४६४।। हे मुनीन्द्र ! मुवर्णमय कमल के मध्य में कणिका पर विराजमान, मल तथा कलंक से रहित, शरद ऋतु के पूर्ण चन्द्रमा की किरणों के समान गौरवर्ग के धारक, आकाश में गमन करते हुए, तथा दिशाओं में व्याप्त होते हुए, ऐसे श्री जिनेन्द्र : के सदृश इस मन्त्रराज का स्मरण अर्थात ध्यान करो। उस मंत्रराज के क्या मत्त है ? . . . . . . . . .
बुद्धः कश्चिद्धरिः कैश्चिदजः कश्चित्महोश्वरः ।
शिवः सार्वस्तथैशानः सोऽयं वर्षः प्रकीर्तितः ॥४६५।। कितने ही इस (हूँ') अक्षर को कितने ही हरि ब्रह्मा, बुद्ध कितने ही महेश्वर, 'कितने ही शिव, कितने ही सार्व और कितने ही ईशानस्वरूप कहते हैं ।
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