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अध्याय : पांचवां ।
[ २५७ तत्पश्चात् पार पत्रों से विभूषित मुख कमल के प्रत्येक पत्र पर भ्रमण करते हुए य र ल व श ष स ह इन अाठ वगों का ध्यान करें।
इत्यजस्त्रं स्मरन् योगी प्रसिद्ध वर्णमातृकाम् । .. श्रु तज्ञानाम्बुधः पारं प्रयाति विगतभ्रमः ॥४५७।।
इस प्रकार प्रसिद्ध वर्मा मातृका का निरन्तर ध्यान करता हुआ योगी भ्रम रहित होकर श्रुत ज्ञान रूपी समुद्र के पार (उत्तर तट) को प्राप्त हो जाता है। भावार्थ - इस प्रकार ध्यान करने वाला मुनि श्रुतकेवली हो सकता है ।
कमलदलोदर मध्ये ध्यायन्वर्णाननादिसंसिद्धान् । नष्टादि विषय बोधं ध्याता सम्पद्यते कालात् ।।४५६।।
ध्यान करने वाला पुरुप कमल के पत्र और करिका के मध्य में अनादि संसिद्ध (पूर्वोक्त ४६) अक्षरों का ध्यान करता हुना कितने की काल में नयादि वस्तु सम्बन्धी ज्ञान को प्राप्त करता है ।
जाप्याज्जयेत् क्षयमरोचक मग्निमान्द्य,.. कुण्ठोदरात्मक सनश्व सनादि रोगान् । प्राप्नोति चाप्रतिमवांमगहती महद्भयः,
पूजां परत्र च गति पुरुषोत्तमाप्ताम् ॥४५६।।
इस वर्ग मातृका के जाप से योगी क्षयरोग, अरुचिपना, अग्निमंदता, कुष्ठ, . उदर रोग, कास तथा श्वास आदि रोगों को जीतता है; और वचनासिद्धता, महान् . पुरुषों से पूजा तथा परलोक में उत्तम पुरुषों से प्राप्त की हुई, श्रोष्ठ गति को प्राप्त होता है । चित्र नं. १३: मन्त्रराज का स्वरूप, जो अनाहत है---
अथ मन्त्रपदाधीशं सर्व तत्त्वकनायकम् । प्रावि मध्यान्त भेवेन स्वरव्यञ्जन सम्भवम् ।।४६०॥ ॐ धोरेफसंरुद्ध सपर बिन्दु लाच्छितम् । अनाहल युतं तस्वं मन्त्रराज प्रचक्षते ॥४६१।।
अब समस्त मन्न पदों का स्वामी, सब तत्वों का नायक, अादि मध्यं और अन्त के भेद से स्वर तथा व्यञ्जनों से उत्पन्न, ऊपर और नीचे रेफ (र) से रुका हुआ तथा बिन्दु ( 1 से चिह्नित सपर कहिये हकार अति (ह) ऐसा बाजीक्षर तत्त्व है;
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