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________________ । २६२ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि इस अनाहत मंत्र के ध्यान से ज्यानी के अगिमा आदि सर्व सिद्धियाँ होती हैं, और दैत्यादिक सेवा करते हैं तथा अाज्ञा और ऐश्वर्य होता है, इसमें संदेह नहीं है। क्रमाच्याव्य लक्ष्येभ्यस्ततोऽलक्ष्ये स्थिरं मनः । ___ दधतोऽस्य . स्फुरत्यन्त ज्योतिरत्यक्ष मक्षयम् ।।४८४॥ तत्पश्चात् क्रम से लक्ष्यों (लखने योग्य बस्तुओं) से छुड़ा कर, अलक्ष्य में अपने मन को धारणा करते हुए ध्यानी के अन्तरंग में अक्षय इंद्रियों के अगोचर ज्योति अर्थात् ज्ञान प्रकट होता है । इति लक्ष्यानुसारेण लक्ष्याभावः प्रकीर्तितः । तस्मिस्थितस्य मन्येऽहं मुनेः सिद्ध समीहितम् ॥४८५॥ इस प्रकार लक्ष्य के अनुसार लक्ष्य का प्रभाव कहा गया; सो, प्राचार्य महाराज उत्प्रेक्षा से कहते हैं कि उस अलक्ष्य में स्थिर रहने वाले मुनि के वांछित कार्य : को मैं सिद्ध हुआ मानता हूँ। एतत्तत्वं शिवाख्यं वा समालम्ब्य मनीषिणः । उत्तीर्ण जन्मकान्तार मनन्तं क्लेशसंकुलम् ।।४८६॥ इस अनाहत तत्व अथवा शिवनामा तत्त्व का अवलंबन करके मनीषि गण अनन्त क्लेश सहित संसार रूपी वन से पार हो गये; इस प्रकार मंत्रराज पीर अनाहत दोनों मंत्रों के ध्यान का विधान कहा । चित्र नं. १५. देखें ।। 'नौं कार के ध्यान का स्वरूप स्मर दुःखानल ज्वाला-प्रक्षान्तेर्नवनीरदम् । प्रगम वाङ्गमान्यज्ञान प्रदीपं पुण्य शासनम् ॥४८७।। हे मुने ! तू प्रणाम नामा अक्षर का स्मरण कर अर्थात् ध्यान कर, क्योंकि - यह प्राव नामा अक्षर दुःख रूपी अग्नि की ज्वाला को शान्त करने के लिए मेघ की समान है तथा बाङमय (समस्त श्रुत) के प्रकाश करने के लिये दीपक है और पुण्य का शासन है। . यस्माच्छब्दात्मकं ज्योतिः प्रसूतमति निर्मलम् । वाच्य वाचक . संबंधस्तेनैव परमेष्ठिनः ।।४८८।। इस प्रणव से अतिनिर्मल शब्द रूपी ज्योति अधीन जान उत्पा हुआ है और परमेष्ठी का बाच्य वाचक संबंध भी इसी प्रणव से होला है अर्थात् परमेाली तो इस :
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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