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अध्याय : ग्यारहवां ]
[ १०२३ एक चन्द्रमुखी नवयुवती के मुख पर जब कालिक लग गई, तब वह दर्पण में अपना मुख देखी तो बहुत कुरूप दिखाई पड़ी। वह सोची कि दर्पण में मेरा चेहरा कुरूप दिखाई देना था, इसलिए मेरे मुख पर कालीक लगी, एवं कुरूप हो गयी । इस प्रकार दिखाई देने का उपादान दर्पण में होने के कारण यह सब निमित्त अपने आप हो गया। इस प्रकार सोचकर क्रोध से दर्पण को नीचे पटक दिया तो दर्पण पैर में लगा एवं पांव कट गया । इस प्रकार तुम्हारा न्याय है। भगवान निश्चय से अपनी आत्मा को ही जानता देखता है । व्यवहार से सर्व पदार्थों को जानतें देखते हैं । आत्मा का प्रात्यन्तिक निर्मलता के कारण दर्षगा की तरह अन्य वस्तु झलकती हैं।
जाणदि पस्सदि सव्वं व्यवहार गएण केवली भगवं । केवलरणारपो जारसदि पस्सदि रिणयमेण अप्पारसं ॥२१६२॥
जिस प्रकार केवली अनन्तानंत को जानने मात्र से उसको शान्त नहीं कर देते. उसी प्रकार त्रिकालवर्ती समस्त पदार्थों को जानने मात्र से भगवान उन सब पदार्थों का नियन्त्रण कर्ता वा पर्यायों को क्रमबद्ध से व्यान्ध' करके नियत समय में भेजने ( Suppaly ) वाला नहीं। अतः पदार्थ जिस पर्याय रूप परिणमन करता है, उस पर्याय का वह कर्ता होने के कारण वह उसका फल भोगने वाला है।
जह सिप्पियो दु चेझैं कुन्वदि हवदि य तहा अण्णो सो। सह जीवो बि व कम्म कुब्धदि हदि य असणे सो ॥२१६३॥ जह चेलू कुन्वंतो दु सिपिनो बिचक्खिदो होदि । तत्तो सिया अणणो तह चेठेतो दुहि जीवो. ॥२१६४॥ रागो दोसो मोह जीयस्सेव य अरणपणपरिणामा। .
राग, द्वेष, मोह जीव का हो अनन्य परिणाम है.1 जैसे स्वर्गकरादि शिल्पी कुण्डलादि ऐसे बनाऊंगा, इस प्रकार मन में चेष्टा करता है तथा उस चेष्टा से बह तन्मय हो जाता है । उसी प्रकार जीव भी रागादि भाव कम करता है और वह उस भाव कर्म से तन्मय हो जाता है। जैसे स्वर्णकरादि शिल्पी चेष्टा करता हुआ नित्य दुःखी होता है और उस दुःख से अनन्य होता है, उसी प्रकार जोक हर्ष-विषाद, राग अन्याय व्यभिचार रूप चेष्टा करता हुआ दुःखो होता है और उस दुःख से यह अनन्य है । अतः तुमने व्यभिचार करने का विचार किया फिर उस क्रिया को किया