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________________ ५२२ ] । गो. प्र. चिन्तामरिण यवेयकों के ऊपर नव अनुदिश. और नव अतुदिशों के ऊपर पांच अनुतर विमान हैं। एक लाख योजन ऊँचा मेरू पर्वत है । मेरू पर्वत की चोटी और सौधर्मस्वर्ग के इन्द्रक ऋतुविमान में एक बालमात्र का अन्तर है । मेरु के ऊपर ऊर्ध्वलोक, - मेरु से नोचे अधोलोक और मेरु के बराबर मध्यलोक या तिर्यक् लोक है । - सौधर्म और ऐशान स्वर्ग के इकतीस पटल हैं, उनमें प्रधम ऋतुपटल है । ऋतुपटल के बीच में ऋतु नामक पैंतालीस लाख योजन विस्तृत इन्द्रक (मध्यवर्ती) विमान है । ऋतुविमान से चारों दिशाओं में चार विमान श्रेणियां हैं। प्रत्येक विमान श्रेणी में बासठ विमान हैं। विदिशाओं में प्रकीर्णक विमान हैं। ऋतु पटल से ऊपर प्रभा नामक अन्तिम पटल पर्यन्त प्रत्येक पटल के प्रत्येक श्रेणी विमानों की संख्या क्रम से एक-एक कम होती गई है। इस प्रकार अन्तिम पटल में, प्रत्येक दिशा में बत्तीस श्रेणी विमान हैं। प्रभः नामक इकतीसवें पटल के मध्य में प्रभा नामक इन्द्रक विमान है। इन्द्रक विमान की चारों दिशाओं में चार विमान श्रेणियां हैं। प्रत्येक विमान श्रेणी में बत्तीस विमान हैं । दक्षिण दिशा में जो विमान श्रेणी है, उसके अठारहवें विमान में सौधर्म इन्द्र का निवास है, और उत्तर दिशा के अठारहवें विमान में ऐशान इन्द्र रहता है। उक्त दोनों विमानों के तीन-तीन कोट हैं। बाहर के कोट में अनीक और पारिषद जाति के देव रहते हैं। मध्य के कोट में त्रायस्त्रिश देव रहते हैं, और तीसरे कोट के भीतर इन्द्र रहता है। इस प्रकार सब स्वर्गों में इन्द्रों का निवास समझना चाहिये । पूर्व, पश्चिम और दक्षिण दिशा की तीन विमान श्रेणियां और आग्नेय और नैऋत्य दिशा से प्रकीर्णक विमान सौधर्म स्वर्ग की सीमा में है। उत्तर दिशा की एक विमान श्रेणी और ईशान दिशा के प्रकीर्णक विमान ऐशान स्वर्ग की सीमा इसके ऊपर सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्ग है। इनके सात पटल हैं । प्रथम अञ्जन पटल के मध्य में अंजन नामकं इन्द्रक विमान है । इन्द्रक विमान की चारों दिशानी में चार विमान श्रेणियां हैं। प्रत्येक श्रेणी में इकतीस विमान हैं। प्रथम पटल से अन्तिम पटल पर्यन्त प्रत्येक पटल में, प्रत्येक श्रेणी में विमानों की संख्या क्रमश: एक-एक कम हैं। सात पटल में 'इन्द्रक विमान की चारों दिशाओं में चार
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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