________________
अध्याय: सातवां ]
वैमानि देवों के भेद ---.
कल्पाः कल्पातीतश्च ॥१२१४॥
वैमानिक देवों के दो भेद हैं— कल्पोपपन्न और कल्पातीत । कल्प प्रर्थात् कल्पोपपन्न और नवग्रैवेयक, नव अनुदिश और वाले देव कल्पातीत कहलाते हैं । और ज्योतिषी देवों में भी इन्द्र आदि का कल्प
या भेद है, फिर भी रूढ़ि के कारण वैमानिक देवों की ही कल्पोपपन्न संज्ञा है ।
सोलह स्वर्गों में उत्पन्न होने वाले देव पांच अनुत्तर विमानों में उत्पन्न होने raft rararat व्यन्तर
{ ५२१
विमानों का क्रम -
उपर्युपरि ।।१२१५।।
कल्पोपपन्न और कल्पातीतं देवों के विमान क्रमशः ऊपर-ऊपर हैं। अपना उपरि-परि शब्द समीपदाची भी हो सकता है। इसलिए यह भी अर्थ हो सकता है कि प्रत्येक पटल में दो-दो स्वर्ण समीपवर्ती हैं। जिस पटल में दक्षिण दिशा में सोधर्म स्वर्ग है, उसी पटल में उत्तर दिशा में उसके समीपवर्ती ऐशान स्वर्ग भी है। Turfar देवों के रहने का स्थान-
सौधर्मशानसनत्कुमार माहेन्द्र ब्रह्मब्रह्मोत्तर लान्तवं कापिष्ट शुक्र महाशुक्र शतार सहस्त्रारेध्यानत प्रापतयोराररगाच्युतयोर्नदसु ग्रैवेयकेषु विजय वैजयन्त जयन्ता पराजितेषु सर्वार्थसिद्धौ च ।। १२१६।।
सौधर्म, ऐशान, सानत्कुमार, माहेन्द्र, ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लान्तव, कापिष्ठ, शुक्र, महाशुक्र, शतार, सहस्त्रार, प्रान्त, प्रारगत, आरण और अच्युत इन सोलह स्वर्गों में तथा नवग्रैवेयक तव अनुदिश और विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित श्रीर सर्वार्थसिद्धि इन पांच अनुत्तर विमानों में वैमानिक देव रहते हैं ।
इस सूत्र में यद्यपि नव अनुदिशों का नाम नहीं आया है, लेकिन 'नवसु ग्रैवेयकेषु' में नव शब्द को नव अनुदिशों को ग्रहण करने के लिए पृथक रखा गया है । सूत्र में सर्वार्थसिद्धि को सर्वोत्कृष्ट होने के कारण "सर्वार्थसिद्धी" इस प्रकार पृथक रखा गया है । प्रत्येक स्वर्ग का नाम उस स्वर्ग के इन्द्र के नाम से पड़ा है ।
सबसे नीचे सौधर्म पर्यन्त क्रमशः दो-दो कल्प हैं।
और ऐशान करूप है, आरण और अच्युत
और इनके ऊपर अच्युत स्वर्ग कल्प के ऊपर नव ग्रैवेयक, नव