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________________ TEAAAAAAAADAV KuniPORN ५२० ] [ गो. प्र. चिन्तामणि प्रत्येक चन्द्रमा के ग्रहों की संख्या अठासी है, और नक्षत्रों की संख्या अट्ठाईस है। मानुषोतर पर्वत से बाहर के सूर्यादि की संख्या आगमानुसार समझ लेनी चाहिये ।। व्यवहार काल का हेतु-- तस्कृतः काल विभागः ॥१२११॥ दिन, रांत, मास आदि व्यवहार काल का विभाग नित्य गमन करने वाले ज्योतिषी देवों के द्वारा किया जाता है । काल के दो भेद. हैं- मुख्यकाल और व्यवहार काल । मुख्यकाल का वर्णन अगले अध्याय में किया जायेगा । समय, प्रावली, मिनिट, घण्टा, दिन-रात आदि व्यवहार काल हैं । . . बहिरवस्थिताः ॥१२१२॥ मनुष्य लोक के बाहर के सब ज्योतिषी देव स्थिर हैं। चन्द्रमा के विमान के उपरितन भाग का विस्तार प्रमाण योजन के इकसठ भागों में से छप्पन भाग प्रमाण १.५६/६१ योजन) है सूर्य के विमान के उपरितन भाग का विस्तार प्रमाण योजन के इकसठ भागों में से अड़तालीस भाग प्रमाण (४८/६१ योजन) है। शुक्र के विमान का विस्तार एक कोश, बृहस्पति के विमान का विस्तार कुछ कम एक कोश और मङ्गल, बुध और शनि के विमानों का विस्तार 'श्राधा कोश है। . . निक देवों का वर्णन वैमानिकाः ॥१२१३॥ विमानों में रहने वाले देव वैमानिक कहलाते हैं। जिनमें रहने वाले जीव अपने को विशेष पुण्यात्मा मानते हैं, उनको विमान कहते हैं । विमान तीन प्रकार के होते हैं--इन्द्रक विमान, शेशी विमान और प्रकोएक विमान । मध्यवर्ती विमान को इन्द्रक विमान कहते हैं । जो किमान चारों दिशाओं में पंक्ति में अवस्थित रहते हैं, वे श्रेरिण विमान हैं । इधर-उधर फैले दुए अक्रमबद्ध विमान प्रकीर्णक विमान हैं। इन विमानों में जो देव प्रासाद हैं तथा जो शाश्वत जिन चैत्यालय हैं, वे सब प्रकृत्रिम हैं। इनका परिमाण मानवयोजन कोश आदि से जाना जाता है। अन्य शाश्वत या अकृत्रिम पदार्थों का परिमारण योजन कोश आदि से किया जाता है । यह परिभाषा है । परिभाषा नियम बनाने वाली होती है।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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