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________________ अध्याय : सातवा ] विमान श्रेणियां हैं। प्रत्येक श्रेणी में पच्चीस विमान हैं। इस पटल की दक्षिण श्रेणी के पन्द्रहवें विमान में सानत्कुमार और उत्तर थेगो के पन्द्रहवें विमान में माहेन्द्र इन्द्र रहते हैं। इसके ऊपर ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर स्वर्ग हैं। इनके चार पटल हैं। प्रथम अरिष्ट पटल के मध्य में अरिष्ट नामक इन्द्रक विमान की चारों दिशाओं में चार विमान श्रेणियां हैं, प्रत्येक श्रेणी में चौबीस विमान हैं। ऊपर के पटलों में श्रेणी विमान की संख्या क्रमशः एक-एक कम हैं । चौथे पटल में प्रत्येक श्रेणी में इक्कीस विमान हैं । इस पटल की दक्षिण श्रेणी के बारहवें विमान में ब्रह्मन्द्र और उत्तर श्रेणी के बारहवें विमान में ब्रह्मोत्तर इन्द्र रहते हैं। इसके ऊपर लान्तव और कापिष्ट स्वर्ग हैं। इनके दो पटल हैं--ब्रह्म हृदय और लान्तव । प्रथम पटल की प्रत्येक विमान श्रेणी में बीस विमान हैं। और द्वितीय पटल की प्रत्येक विमान श्रेणी में उन्नीस विमान हैं । इस पटल की दक्षिरण श्रेणी के नौवें विमान में लान्तब और उत्तर श्रेणी के नौवें विमान में कापिष्ट इन्द्र रहते हैं। इसके ऊपर शुक्र और महाशुक्र स्वर्ग हैं। इनमें महाशुक्र नामक एक ही पटल है । इस पटल के मध्य में महाशुक्र नामक इन्द्रक विमान है । चारों दिशाओं में चार विमान श्रेणियां हैं। प्रत्येक विमान श्रेगी में अठारह विमान हैं । दक्षिण श्रेणी के बारहवें विमान में शुक्र और उत्तर श्रेणी के बारहवें विमान में महाशुक्र इन्द्र रहते हैं । ___ इसके ऊपर शतार और सहस्त्रार स्वर्ग है। इनमें सहस्त्रार नामक एक ही पटल है । चारों दिशाओं में प्रत्येक श्रेणी में सतरह विमान हैं। दक्षिरण श्रेणी के गौवें विमान में शतार और उत्तर श्रेणी के नौवें विमान में सहस्त्रार इन्द्र रहते हैं । इसके ऊपर पानत, प्रारणत, पारण और अच्युत स्वर्ग हैं। इनमें छह पटल है । अन्तिम अच्युत पटल के मध्य में अच्युत नामक इन्द्रक विमान है। इन्द्रक विमान से चारों दिशाओं में चार विमान श्रेणियां हैं। प्रत्येक विमान श्रेणी में ग्यारह विसान हैं। इस पटल की दक्षिण श्रेणी के छह विमान में प्रारण और उत्तर श्रेमी के छठवें विमान में अच्युत इन्द्र रहते हैं। ___इस प्रकार लोकानुयोग नामक ग्रन्थ में चौदह इन्द्र बतलाये हैं। श्रतसागर प्राचार्य मत से तो बारह ही इन्द्र होते हैं । प्रादि दार और अन्त के चार इन पाय ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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