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समय-4
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[ गो, प्र. चिन्तामरिग सवर्गों के पाठ इन्द्र और मध्य के आठ स्त्रों के चार इन्द्र अर्थात् ब्रह्म, लान्तव, शत्रु और शतार इस प्रकार सोलह स्वर्गों में बारह इन्द्र होते हैं।
विमानों की संख्या-सौधर्म स्वर्ग में बत्तीस लाख, ऐशान स्दगों में अटाईस लाख, सानत्कुमार स्वर्ग में बारह लाख, माहेन्द्र में प्राठ लाख ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर में चालीस लाख, लान्तव और का पिष्ट में पचास हजार, शुक्र और महाशुक्र में चालीस हजार, शतार और सहस्त्रार में छह हजार, प्रानत, प्राणत, पारण और अच्युत स्वर्ग में सात सौ विमान हैं । प्रथम तीन ग्रंबेयकों में एक सौ ग्यारह, मध्य के तीन ग्रंयकों में एक सौ सात और ऊपर के तीन मैवेयकों में एकानवे विमान हैं। नव अनुदिश में नौ विमान हैं। सर्वार्थासद्धि पटल में पांच विमान हैं, जिनमें मध्यवर्ती विमान का नाम सर्वार्थसिद्धि है, पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशा में क्रम से विजय, बैजयन्त, जयन्त और अपराजित विमान हैं।
. विमानों का रंग-सौधर्म और ऐशान स्वर्ग के विमानों का रंग श्वेत, पीला, हरा, लाल और काला है। सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्ग में विमानों का रंग श्वेत, पीला, हरा, लाल है । ब्रह्म ब्रह्मोत्तर, लान्तव, और कापिष्ट स्वर्ग में विमानों का रंग श्वेत, पीला और लाल है । शुक्र से अच्युत स्वर्ग पर्यन्त विमानों का रंग श्वेत और पीला है। नव गैवेयक, नव अनुदिश और अनुत्तर विमानों का श्वेत ही है । सर्वार्थसिद्धि विमान परमशुक्ल है और इसका विस्तार जम्बूद्वीप के समान है । अन्य चार विमानों का विस्तार असंख्यात करोड़ योजन है।
उक्त प्रेसठ पटलों का अन्तर भी असंख्यात करोड़ योजन है।
मेरु से ऊपर डेढ़ राजू पर्यन्त क्षेत्र में सौधर्म और ऐशान स्वर्ग हैं । पुनः डेढ़ राजू. प्रमाण क्षेत्र में सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्ग हैं । ब्रह्म से अच्युत स्वर्ग पर्यन्त दोदो स्वर्गों की ऊंचाई आधा राजू है । और गैवेयक से सिद्धशिला तक एक राजू ऊंचाई है । ऊर्ध्व लोक में जितने विमान हैं, सभी में जिनमन्दिर हैं। वैमानिक देवों में उत्कर्ष---- .. स्थिति प्रभाव सुखयति लेश्याविशुद्धीन्द्रियावधि विषयतोऽधिकाः ॥१२१७॥
वैमानिक देवों में क्रमशः ऊपर-ऊपर आयु, प्रभाव-शाप और अनुग्रह की शक्ति, सुख-इन्द्रिय सुख, दीप्ति-शरीर कान्ति, लेश्याओं की विशुद्धि, इन्द्रियों का विषय और अवधिज्ञान के विषय की अधिकता पाई जाती है ।