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अध्याय : पाठवां ] मुनिसुव्रत काव्य में लिखा है---
गर्भस्थ लिंग परमाणु करुपमप्येतदं गेष्वनवेक्ष्यरक्षी । जगत्त्रयोद्धारसदोहदेन परं नराणां बुबुधे ससत्वां ॥१५५६।।
अर्थात् भगवान के पिता ने जिनेन्द्र जननी के शरीर में परमाणु प्रमाण भी गर्भका कार्य के चिन्ह - देशाकर, के उल जगत्त्रयं के उद्धाररूप दीहला से उसे गर्भवती समझा। इस कथन से जिनेन्द्रजननी की शरीरस्थिति सम्बन्धी परिस्थिति का ज्ञान होता है, वैसे भगवान के गर्भ कल्याणक सम्बन्धी अपूर्व सामग्री को देखकर सभी जीव प्रभु के गर्भादतरण को भली प्रकार जानते थे और उनके जन्म महोत्सव देखने की ममता से एक-एक क्षण को ध्यानपूर्वक गिला करते थे । महापुराणकार ने लिखा है -
रत्नगर्भा धरा जाता हर्ष गर्भाः सुरोत्तमाः ।।.. क्षोभमायाजगद्गर्भो गर्भाधानोत्सवे विभोः ।।१५६०॥
अर्थात् भगवान के गर्भ कल्याणक के उत्सव के समय पृथ्वी तो रत्नवर्षा के कारण रत्नगर्भा हो गई है। सुरराज हर्ष गर्भ अर्थात् हर्ष पूर्ण हो गए हैं । जगत्गर्भ अर्थात् पृथ्वी मंडल क्षोभ को प्राप्त हुआ था अर्थात् संसार भर में प्रभु के गर्भावतरण की वार्ता विख्यात हो गई थी।
प्रश्न:-~-देवियां माता से क्या प्रश्न करती हैं और माता उनका क्या उत्तर देती हैं ?
उत्तर :-देवियों के माता से किये गये प्रश्नोत्तरों की रूपरेखा-गर्भस्थ शिशु जैसे-जैसे वर्धमान हो रहे थे, वैसे-वैसे माता की बुद्धि विशुद्ध होती जा रही थी। नववा माह निकट आने पर सेवा में संलग्न देवियों ने अत्यन्त गूढ़ तथा मनोरंजक प्रश्न माता से पूछना प्रारम्भ किया तथा माता द्वारा सुन्दर समाधान प्राप्त कर वे हर्षित होती थीं । देवियों ने पूछा--(महापुराण में लिखा है)
का पंजरमध्यास्ते कः पहषनिस्वमः ।
कः प्रतिष्ठा जोवानां कः पायोऽक्षरच्युतः ॥१५६१॥ __ माता ! पिंजरे में कौन रहता है ? कठोर झालंद करने वाला कौन है ? जीवों का प्राश्रय कौन है ? अक्षर ध्युतं होने पर भी पढ़ने योग्य क्या पाठं है । इन प्रश्नों का माता में उत्तर दिया--