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[ गो. प्र. चिन्तामरिण त्रिलोकसार में लिखा है कि सौधर्म स्वर्ग का इन्द्र उसकी इन्द्राणी. वहां से चयकर एक मनुष्य भव धारण करके मोक्ष को प्राप्त करते हैं । सौधर्मेन्द्र तो साधिक दो सागर प्रमाण देवायुपूर्ण होने के पश्चात् मनुष्य होकर मोक्ष जाता है, किन्तु उसकी पट्टदेवी शची पचपन पल्य प्रमाण वायु को भोग मनुष्य होकर शीघ्र मोक्ष जाती है । सागर प्रमाण स्थिति के समक्ष पचपन पत्य की प्रायु, बहुत कम हैं । इन्द्राणी के शोध मोक्ष जाने का कारण यह है कि जिनमाता और जिनप्रभु की सेवा का उत्कृष्ट सौभाग्य उसे प्राप्त होता है । इस कार्य से उसे अपूर्व विशुद्धता प्राप्त होती है। लौकान्तिक देव की पदवी महान हैं । उसकी स्थिति पाठ. सागर है । सर्वार्थसिद्धि के देव लोकोत्तर हैं। उनकी स्थिति ३३ सागर है । इतने लम्बे काल के पश्चात् उन महान् देघों को मोक्ष का लाभ मिलता है। शची का भाग्य अद्भुत हैं । स्त्रीलिंग छेदकर वह शीघ्र निर्वाण को प्राप्त करती है। जिनेन्द्र भगवान की भक्ति का प्रत्यक्ष उदाहरण इन्द्राणी है । त्रिलोक सार में कहा है--
सोहम्मो वरदेवी सलोमयाला क्विणमारा । लोयंतिय सव्वट्ठा लदो चुना गिधुदि जंति ॥१५५७।।
सौधर्मेन्द्र, शची, उनके सोम, आदि लोकपाल, दक्षिणेन्द्र, लौकान्तिक, सर्वार्थसिद्धि के देव वहां से चय करके नियम से मोक्ष जाते हैं. । .
जिनमाता के दोहला-माता की सेवा में तत्पर. श्री। अादि..देवियों ने वया। कार्य किया इसे महाकवि जिनसेनाचार्य कहते हैं
श्री ही तिश्च कीतिश्च बुद्धिलक्ष्म्यौ च देवताः । श्रियं लज्जा च धैर्य च स्तुति-बोधं च वैभवम् ।।१५५८॥
श्री देवी ने माता में श्री अर्थात शोभा की वृद्धि की। ह्री देवी ने ही अर्थात लज्जा की, धृतिदेवी ने धैर्य की, कोति देवी ने स्तुति की, बुद्धि देवी ने ज्ञान की वृद्धि, की तथा लक्ष्मी देवी ने विभूति बढ़ाई.।। - माता के, शरीर में गर्भ वृद्धि का बाह्य चिल न देखकर शंकितः मनको इससे शान्ति मिलती थी. कि जिन माता की तीव्र अभिलाषा त्रिभुवन के उद्धार रूप दोहला में हुआ करती है ! . . .
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