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________________ अध्याय : आठवां ] [ ६३७ काव्य में कहा है--'अस्वप्नपूर्व हि जीवानां नहि जातु शुभाशुभम् . जीवों के कभी भी स्वप्न दर्शन के बिना शुभ तथा अशुभ नहीं होता है । इस विद्या के ज्ञाताओं की प्राज उपलब्धि न होने से उस विद्या को अयथार्थ मानना भूल भरी बात है । तुलनात्मक रीति से विविध धर्मों का साहित्य देखा जाय, तो भावि जिनेन्द्र शिशु की श्रेष्ठता को सुचित करने वाले उपरोक्त स्वप्न जिनमाता के सिवाय अन्य माताओं को नहीं दिखते। इस स्वप्न दर्शन के प्रश्न पर गम्भीरतापूर्वक दृष्टि डालने वाले को जिनेन्द्र तीर्थकर की श्रेष्ठता स्वयं समझ में आये बिना न रहेगी। माता के गर्भ में पुण्यहीन शिशु के आने पर अमंगल स्वप्न पाते हैं । उपरोक्त स्वप्न दर्शन के पश्चात् तीर्थकर होने वाली आत्मा माता के गर्भ में भा गई। उस समय समस्त सुरेन्द्रादि गर्भावतरण की बात विविध निमित्तों से जानकर अयोध्यापुरी में पाए । सब देवेन्द्रों तथा देवों ने नगर प्रदक्षिणा की और महाराज नाभिराज तथा माता देवी को गमगार किया : बड़े हर्म से गर्भ कल्याण का महोत्सव मनाया गया । भगवान स्वर्ग छोड़कर अयोध्या में आए हैं, किन्तु उनकी सेवा में तत्पर देवदेवी समुदाय को देखकर ऐसा लगता है कि स्वर्ग का स्वर्ग ही उन प्रभु के पीछे-पीछे वहां आ गया है। देवताओं का चित्त स्वर्ग लौट जाने को नहीं होता था, कारण जो निधि जिनेन्द्र भगवान के रूप में अब अयोध्या में आ गई हैं, वह अन्यत्र नहीं है । जिमेन्द्र भक्ति का अद्भुतफल जिनेन्द्र भक्ति और इन्द्र-इन्द्राणी प्रादिका अद्भुत भाग्य---माता का मनोरंजन तथा सेवा का कार्य देवांगनाएँ करने लगी । इन्द्र का एक मात्र लक्ष है कि देवाधिदेव की सेवा श्रेष्ठ रूप में सम्पन्न हो । इस सेवा तथा भक्ति का पुरस्कार भी तो असाधारण प्राप्त होता है । बादिराज सूरि ने एकीभाव स्तोत्र में लिखा है - भगवन ! इन्द्र ने आपकी भली प्रकार सेवा की इसमें आपकी महिमा नहीं है । महत्त्व की बात यह है कि उसे सेवा के प्रसाद से उस इन्द्र का संसार परिभ्रमरण छूट जाता है। कहा भी है... इन्द्रः सेवां तथ सुकुरुता कि तया श्लाघनं ते । तस्यैदेयं भवलयकरी श्लाध्यतामासनोति ॥१५५६॥
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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