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________________ ६३६ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि कर रहे हैं ऐसी लक्ष्मी को देखा, ५. लटकती हुई दो फूलों की मालाएँ देखी ६. चान्दनी युक्त पूर्ण चन्द्रमा को देखा, ७. उदय होते हुए सूर्य को देखा, ८. सरोवर में क्रीड़ा करने वाले दो मीन देखे, C. कमलाच्छादित सुवर्णमय दो पूर्ण कलश देखे, १०. पद्म सरोवर देखा, ११. उन्मत्त लहर युक्त समुद्र देखा, १२. रत्न जड़ित सिंहासन देखा, १३. रत्नeft aisa देव विमान देखा, १४. नागेन्द्र भवन देखा, १५. प्रकाशमान रत्नराशि देखी, १६. धूमरहित प्रखर प्रखर अग्नि ज्वाला देखी । उन सोहल स्वप्नों के फल -- भगवान के पिता जिनेन्द्र जननी को स्वप्नों का फल इस प्रकार बताते - मुनिसुव्रत काव्य में लिखा है कि नागेन तु गचरितो वृषतो वृषात्मा सिंहेन विक्रमघनो रमयाऽधिकश्रीः । स्वग्भ्यांघूतश्च शिरसाशशिनात्कम स् िसूर्येपदीप्तिमहितो ऋषतः सुरूपः ॥ कल्याणभाक्कलशतः सरसः सरस्तोगंभीर धोरुवधिनासनतस्तदीशः । देवाहिवास - मणिराश्यनलेः प्रतीतवेवोरगागमगुणोद्गमक मंदाहः ।।१५५५ ।। हे देवी! राजेन्द्र दर्शन से सूचित होता है कि तुम्हारा पुत्र उच्च चारित्र वाला होगा, वृषभ दर्शन से धर्मात्मा सिंह दर्शन से पराक्रमी, लक्ष्मी से श्री संपन्न, माला से सबके द्वारा शिरोधार्य, चन्द्रमा से संसार के संताप को दूर करने वाला, सूर्य दर्शन से अधिक तेजस्वी, मत्स्य दर्शन से रूप संपन्न, कलश से कल्याण को प्राप्त, सरोवर से वात्सल्य भाव युक्त, समुद्र से गंभीर बुद्धि वाला, सिंहासन से सिंहासन का स्वामी, देव विमान से देवों का आगमन, नागभवन से नागकुमार देवों का आगमन, रत्नराशि से गुणों का स्वामी तथा अग्नि दर्शन से सूचित होता है कि वह पुत्र कर्मों का दाह करके मोक्ष को प्राप्त करेगा । माता मरुदेवी के स्वप्न में ऐसा दिखा था कि माता के सुख से वृषभ ने प्रवेश किया उसका फल यह था कि वृषभनाथ भगवान तुम्हारे गर्भ में प्रवेश करेंगे । अन्य तीर्थंकरों के श्रागमन के समय वृषभ के आकार के स्थान में गजाकार धारी शरीर का मुख्य द्वार से प्रवेश होता है । जिनेन्द्र जननी के समान सोलह स्वप्न अन्य सरागी देवताों की माताओं के नहीं आते हैं । भ्रष्टांग निमित्त विद्या में एक भेद स्वप्न विज्ञान है। नीरोग स्वस्थ व्यक्ति के स्वप्नों द्वारा भविष्य का बोध होता है । क्षेत्रचूडामणि
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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