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________________ अध्याय : पाठकों ] को उसी दिशा में विशेष ज्योति की आभा दिखाई पड़ती हैं और वह दिशेश सबके नेत्रों को विशेष रमणीय लगती है। इसी प्रकार जिनेन्द्र जननी के गर्भ से दया धर्म के संय तो कर परमदेव का जन्म होने के पहले से हो अपू सौभाग्य और सातिशय पुण्य को प्रभा दृष्टि गोचर होती है । तीर्थकर भगवान के जन्म लेने के पहले से ही वह भावी जिनमाता मनुष्यों की तो बात ही क्या! देवेन्द्रों तथा इन्द्राणियों के द्वारा भक्ति पूर्वक सेवा तथा पूजा को प्राप्त करती है। सचमुच में जिनेन्द्र की जननी का भाग्य और पुथ्य अलौकिक है । नेमिचन्द्र प्रतिष्ठापाठ में गर्भ कल्याणक के प्रकरण में भगवान की. माता की आदर पूर्वक पूजा करते हुये यह पद्य लिखा गया है-- विश्वेश्वरें विश्वजगत्सवित्रि पूज्ये महादेवि महासतित्वाम् । सुमंगलेऽWः बहुमंगलार्थैः संभाययामो भवन प्रसन्ना ११५:५४॥ हैं विश्वेश्वरा, विश्वजगत सर्वित्रि पूज्या, महादेवी, महासती, सुमंगला, माता अनेक मंगल रूप पदार्थों के अंर्घ्य द्वारा हम आपकी समाराधना करते हैं.। हे माता हम पर प्रसन्न हो । गर्भ कल्याणर्क गर्भ कल्याणक-- स्वर्ग से अवतरण के छह मास के समय में जैसेजैसे दिन न्यून हो रहे थे, वैसे-वैसे यहां अयोध्यापुरी की सर्वाङ्गीण श्री, वैभव, सुख आदि की वृद्धि हो रही थी । शीघ्र ही वह समय आ गया कि देवायुः का उदयः समाप्त हो गया । मनुष्यायु तथा मनुष्यगत्यानुपूर्व्य का उदय प्रा जाने से वह स्वर्ग की विभूति मानव लोक में पाई और उसने माता मरुदेवी को सोलह स्वप्न दर्शन द्वारा उक्त बात। की सूचना देने के साथ अपने मंगल जीवन की महत्ता को पहले से ही प्रकट कर दिया। जिनेन्द्रजननी के सोलह स्वप्नों का वर्णन प्रत्येक जिनेन्द्र-जननी सोलह स्वप्नों को रात्रि के अंतिम प्रहर में दर्शन के पश्चात् अपने पतिदेव से उनका फल पूछती हैं, जिससे माता को अपार आनन्द प्राप्त होता है। जिनमाता के सोलह स्वप्न--- १. गर्जना करने वाले सफेद हाथी को देखा, २: सफेद बल को देखा; ३. सिंह को देखा, ४. दोनों बाजू से दो कलशाभिषेक
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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