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________________ [ गो. प्र. चिन्तामणि निश्मयमबुद्धयमानो चो निश्चय तस्तमेव संश्रयते । नाशयति करण चरणं स बहिः करणालसो बालः ॥२१५३॥ विषयो सुख का लालची, सुन अध्यात्मवाद । स्याग धर्म को त्याग करे विषयानुराम ॥२१५४॥ प्रात्मानुभव एवं सम्यग्दर्शन का तादात्म्य संबंध है । सम्यग्दर्शन के पश्चात् समस्त पदार्थों का सम्यक् परिज्ञान होने के कारण अन्य वस्तु से स्वयं को पृथक करने की सम्यक् चेष्टा करता है । इसलिये जिस जिस अंश में अन्य विषयादिसे स्वयं को पृथक् का विश्वास, ज्ञान एवं चेष्टा है उस २ अंश में क हीं है अन्य समस्त अंश में बन्धन है। येनांशेन सुदृष्टि स्तेनांशेनास्य बन्धनं नास्ति । येनांशेन तु राग स्तेनाशेनाल्य बन्धनं भवति ॥२१५५।। यह हुआ अबंध का कार्यकारण भाव, इससे अन्य जितना अनध्यावसायादि है, वह सब बंध का कार्यकारण भाव है। अन्यथा संसार मोक्ष का कार्यकारण भाव लोप हो जायेगा; सिद्ध जीव विषयानुभोगी नहीं होने के कारण संसार में परिभ्रमण करेंगे। यथा-यथा न रोंचते, विषयाः सलभा अपि । तथा तथा समायाति, संवितो तत्तवमुत्तमम् ॥२१५६॥ As even those objects of pleasure which are easly obtainable become increasingly intoleralie, in the same measure does the glorious self come into one's enjoy ment! ज्यों-ज्यों सुलभ से प्राप्त होने वाले विषय भोग प्रासक्ति रूप रूचिकर प्रतीत नहीं होते त्यों-त्यों स्वात्म 'संवेदन में निजात्मानुभवन की परिणति वृद्धि को प्राप्त होती रहती है। इससे विपरीत मिथ्यात्व कार्य है, जो कि तुम्हारा कार्य है ! . .. असत पु...-पाप अनेकान्तवाद को जानते हैं इसलिये मेरे ऊपर दोषारोपण कर रहे हैं। मैं इस को कपिने से नहीं करता हूं उस कार्य के समय में ज्ञापक निमित्त उपस्थित होता ही हूँ और सूचना करता है कि उपादान अभी अपनी शक्ति ने अनुसार परिणमन कर रहा है, उस परिगमन का कौन निवारण कर सकता है। जं जस्स जम्मि देसे जेण बिहारण अम्मि कालम्मि । गाणं जिरपेण णियदं जम्म प्रहर मरणं था ॥२१५७।। ..'
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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