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अध्याय : ग्यारहवा ]
[ १०१६ तल्लक्षणं ।" परस्पर मिली हुई अनेक वस्तुओं से किसी एक वस्तु को अलग करने रूप हेतु को लक्षण कहते हैं । सम्यग्दृष्टि का जो लक्षण है, वह तुमको मालूम नहीं एवं तुम में पाया नहीं जाता 1
सम्यग्दृष्टि का लक्षण सुन-- सभ्यग्दृष्टेर्भवति नियतं ज्ञान वैराग्य शक्तिः । स्वं वस्तुत्वं कलयितुमयं स्वान्य रूपाप्ति मुक्त्या । यस्माद् ज्ञात्वा व्यतिकर मिदं तस्वतः स्व परं च । - स्वस्मिन्नास्ते विरमप्ति परात् सर्वतो राग योगात् ।।२१५२।।
सम्यग्दृष्टि के स्वसंवित्ति रूप ज्ञान एवं संसार शरीर, भोगों का त्याग करने रूप वैराग्य शक्ति सुनिश्चय से प्राप्त होती ही है । अतएव स्वरूप की प्राप्ति तथा अपने से भिन्न जितना रागादिक जो पररूप उनके त्याग से निज वस्तु की प्राप्ति करने के लिए स्व तथा पर इनको यथार्थ में भिन्न २ जानकर निज में ही अपनी स्थिति को बनाता है तथा पर के संयोग से होने वाली समस्त रागादि परणति से विरक्त होता है । "तुम्हारे अन्दर सम्यग्दृष्टि के व्यवहार में पाया जाने वाला सदाचार नैतिकाचार रूप अनात्मरूप लक्षण नहीं पाया जाता, तब निश्चय में पाये जाने वाला ज्ञान वैराग्य रूप प्रात्मभूत लक्षण किस प्रकार सम्भव हो सकता है, किन्तु जो असदाचारी स्वच्छन्दी, मनमाना आचरगा करने वाला कभी भी सम्यग्दृष्टि नहीं हो सकता। जिस प्रकार जिसने अनन्त बार मुनिनत धारण कर लिया, वह अभव्य हो सकता है, किन्तु जिसने बाह्य में कपड़ा त्याग नहीं किया वह कभी भी प्रमत्त गुरगस्थानवाला मुनि नहीं हो सकता तो मोक्ष जाने की बात क्या? जिसका व्यवहार चारित्र ज्ञानादि है, वह अभव्य भी हो सकता है। जिसने निश्चय नय को प्राप्त कर लिया उसने व्यवहार नय को प्राप्त कर ही लिया, किन्तु जिसने व्यवहार नय को प्राप्त नहीं किया। वह कभी भी निश्चय नय को प्राप्त नहीं कर सकता। जिस प्रकार जिसने केवलज्ञान प्राप्त किया उसने समस्त ज्ञान प्राप्त कर लिया। किन्तु जिसने मतिज्ञान को ही अभी तक प्राप्त नहीं किया, वह केवल ज्ञान को किस प्रकार प्राप्त कर सकता । इसी प्रकार जिसने निश्चय नय के यथार्थ स्वरूप को नहीं जानकर उसको ही अर्थात् निश्चय श्रद्धान को अंगीकार किया है, वह मूर्ख बाह्यक्रिया में प्रालसी है और बाह्य क्रिया रूप याचरण को नष्ट करता है।
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