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[ गो. प्र. चिन्तामरिण जिस प्रकार बालक का धाय में, व्यभिचारिणी स्त्री में पुरुष का, पद्म पत्र पर जलबिन्दु की तरह लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि जीव भोग करते हुये भी निर्लिप्त रहते हैं । जली हुई रस्सी के समान पाप का भागी नहीं होता, किन्तु निर्जरा का निमित्त होता I
उपभोगमिन्दियेह दयाराम वेदरणाभिवराणं
जं कुणादि सम्मदिट्ठी तं सव्वं सिमर. सम्यग्दृष्टि जीव इन्द्रियों के द्वारा श्रवेतन और चेतन द्रव्य का जो उपभोग करता है, वह सब निर्जरा का निमित्त है। इसलिये सम्यग्दृष्टि जीव जितना अधिक से afe after क्रम से वेतन खाद्य खाद्य परथन, स्वधन, धार्मिक क्षेत्र का धन, चेतन - स्वस्त्री, परस्त्री, वेश्या श्रादि का सेवन करेगा उतना अधिक से अधिक मुरित क्रम से निर्जरा का निमित्त होगा इसलिये तो भरत चक्रवर्ती अन्तमुहूर्त में विज्ञान धनरूप समयसार रूप अध्यात्म ज्योति को प्राप्त कर लिया था ।
न्याया सम्यग्दृष्टिः स्वयमथमहं जातु बंधो न मे स्यात् । segardingent atना रागिपोप्याचरंतुः ॥
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बंता समिति परता ते यतोऽद्यापि पापाः । rican faरहात्सति सम्यक्त्वरिक्ताः ॥ २१५१ ।।
मैं स्वयं सम्यग्दृष्टि हूं । अतएव मेरे कर्म बन्ध कदाचित भी नहीं होता ऐसा विचार कर राग से रंगे मिथ्यादृष्टि जीव ऊपर दृष्टि उठाकर तथा मुंह फुलाकर भी व्रत आचरण करें तथा पंच समिति आदि रूप क्रियायों का आलम्बन करें तथापि आत्मा तथा अनात्मा के भेद विज्ञान के अभाव में तू सम्यग्दर्शन से होन ही हैं । इसलिए इस अवस्था में भी पापी ही है" जब महाव्रत पालन करने वाला भी उन्मत्त होकर अपने को सम्यग्दृष्टि मानकर "सम्यग्दृष्टि विषय भोगते भी बन्धक नहीं है" ऐसा आगम है ऐसी व्याख्या करते हुए अपने को कर्म बन्ध से रहित माने तो वह मिथ्यादृष्टि है और अन्तरंग बहिरंग परिग्रह सहित स्वच्छन्द आचरण करने वाला व्यभिचारी हो कर सम्यग्दृष्टि अपने श्राप बनकर "पर स्त्री सेवने से भी कर्म बन्ध नहीं होता, परंतु निर्जरा होती है, इस प्रकार महान दण्ड का पात्र बनने का वचन कह रहा है । सम्यग्दृष्टि जिस प्रकार आत्मानुभव की ज्ञान तथा संसार शरीर एवं भोगों के त्याग करने रूप शक्ति रूप लक्षण के अभाव से लक्षभूत सम्यग्दर्शन तुम में नहीं । "व्यतिकीर्ण वस्तु व्यावृत्ति हेतु लक्षणं ।" "परस्पर व्यतिकरे सति येनान्यत्वं लक्ष्यले