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________________ अध्याय : ग्यारहवा ] [ १०१७ खुलने लगी तो वह वहां से भाग कर छुप-छुप कर पा गया। उस ने सोचा था कि छाती पर हाथ रखकर सो गई होगी। सो ऐसा कुछ हो गया । इधर धूर्त कामाग्नि में जब एक बार घृत डल गया उसकी कामाग्नि और अत्यन्त प्रज्वलित हो उठी । दूसरे दिन रात को भी पूर्व कथित दुष्ट चेष्टा करने लगा। वह स्त्री भी पूर्व रात की घटना से कुछ शंकित एवं सावधान थी। उस स्त्री ने दुष्ट को पकड़ लिया एवं हल्ला करने लगी। आसपास के. अनेक लोगों ने पाकर व्यभिचारी को पकड़कर बांध लिया है, राजा के दरबार का समय होने पर असत् पुरुष को लेकर दरबार में गये । असत् पुरुष का दुराचार के विषय में न्याय चला। ___ न्यायधीश... (अत्तत् प. सी) सुम प्रतिसा, शपथ करो कि मैं जो कहूँगा. सब सत्य कहूँगा। असत् पुरुष-क्या कभी सम्यग्दृष्टि अनेकान्तवादी असत्य कह सकता है ? न्याया-तुमने इस प्रकार अन्याय क्यों किया? असल--"मातृवत् परदारेषु यः पश्यति सः पण्डितः" क्या इसी प्रकार आचरण करना अन्याय है ? . . स्याया--तुमने उस स्त्री के साथ किस प्रकार माचरण किया? असत्----जिस प्रकार अपनी सन्तान अपनी मां का स्तनपान करती है, पास में शयनादि क्रिया करता है, उसी प्रकार मैंने किया। मैंने सोचा एक नयी मां आई है उसके प्रति मैं माँ का व्यवहार नहीं करूँगा तो अन्याय होगा। इसलिये मैने मेरा कर्तव्य किया। न्याया-तुमने उसके साथ अब्रह्मचारीपना क्यों किया ? पुरिसित्थियाहियालासी इत्थीकम्मं च पुरिसमहिलसदि। . एसा पायरिय परंपरागदा एरिसी दु सुदी ॥२१४८॥ पुरुष वेद कर्म स्त्री की अभिलाषा करता है और स्त्री वेद कर्म पुरुष की अभिलाषा करता है, यह आचार्य परम्परा से प्राई हुई ऐसी श्रुति है। मेरा पुरुष वेद कर्म का उदय सिर्फ बाह्य निमित्त मात्र था, वह स्त्री थी । निश्चय से अब्रह्मचारी का दोष नहीं हो सकता ! . .. . .. धात्री . बालासतीनाथ पधिनी . दलवारिचात् । दग्धरज्जुबदाभासिति भुजानोऽपि न पापभाक् ।।२१४६॥
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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