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[ गो. प्र. चिन्तामरिश विचार करना चाहता है, वह युक्ति का अनुसरण करके उसके ऊपर विचार करता हैं और तदनुसार वस्तु स्वरूप का निश्चय करता है । अनेकान्त रूपी सूर्य के प्रकाश में एकान्ती उल्लू को नहीं दिखाई देने के कारण दिन को रात्रि मानता है और सूर्य की निन्दा करता है, इसी प्रकार दुर्भाग्य केक्कड़ा शासन में जिसका सर्वस्व एवं स्वाधीनता हरण हो जाने के कारण एकान्त से संसार कान्तार में निवास करने वाले एकान्ती को अनेकान्तमयी प्रकाश भी अन्धकारमय (एकान्तमय ) दिखाई देता है एवं एकान्तमयी अन्यकार भी प्रकाशित दिखाई पड़ता है ।
"ही बत तिनीषति युक्ति तंत्र यत्र मतिरस्य निविष्टा" के अनुसार ग्रनेकान्त को भी 'अपने को भाग्य के अधीनता के समय की मर्यादा की वृद्धि करने के लिये एकान्तरूप से ग्रहण करता है, जिस प्रकार एक एकान्ती आध्यात्मिक वादी निम्नोक्त नीति श्लोक पढ़कर अपने आचरण को अनीतिमय करके इहलोक परलोक में दुःखी होता है ।
मातृबत परदारेषु परद्रव्येषु लोवष्ठत् ।
आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पंडितः ।।२१४७॥
'मातृवत् परदारेषु यः पश्यति स पंडितः । परस्त्री को अपनी मां की तरह देखने वाला पंडित है
अतः बालक जिस प्रकार अपनी मां का स्तनपान करता है, उसकी मां के पास सोता है यदि क्रिया करता है उसी प्रकार मैं भी परस्त्री के साथ व्यवहार करके अपनी प्रांसुरी इच्छा को पूर्ति करूँगा और यदि पकड़ा जाऊंगा तो शास्त्र का प्रमाण दे दूँगा, इस प्रकार 'पर द्रव्येषु लोष्ठवत् ग्रात्मवत् सर्व भूतेषु' का अर्थ अपनी स्वार्थ सिद्धि के अनुसार संयोजना करके श्लोक को मुखस्थ कर लिया । एक दिन अपने पड़ोसी के घर दूर ग्राम से एक सुन्दरी नवयुवती मेहमान आई । उस नवयुवती को देखकर अपना आसुरी प्रकृति को वश में नहीं कर पाया । वह अपनी इच्छा को पूर्ण करने के लिये टाइम देखने लगा। उस समय गर्मी के दिन थे । इस लिये सब कोई हवा के लिये रात्रि में बाहर सो गए। वह नवयुवती स्त्री भी बाहर सो गई । अन्धेरी रात्रि में रात के दो बजे समस्त ग्राम सुनसान हो गया । किन्तु harat उल्लू को अमावस्या की रात्रि में भी नवयुवती ही दिखाई दे रही थी । सुयोग पाकर अपनी प्रासुरी इच्छा की पूर्ति करने लगा | जब उस स्त्री को थोड़ी नींद