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अध्याय : स्यारहवां ]
[ १०१५ करुणा विह्वल होकर, परमपुरुषार्थ करने के लिये आश्वासन एवं विश्वास दिलाकर सम्बोधन कर रहे हैं
अयि! कथमपि मत्वा तत्त्वकौतुहली सन् । अनुभव भव भूतः पार्श्ववत्ती मुहूर्तम् ॥ पृथगय विलसन्तं स्वं समालोक्य येन । त्यजसि झमिति मा साकमेकत्व मोहम् ॥२१४५॥
अरे हे भाग्याधीन पुरुष! तू अनादि काल से भाग्य की सत्ता में अपनी संत्ता मानकर उसकी अधीनता को त्यागकर अपनी स्वाधीनता का सुख कभी भी अनुभव नहीं किया, किसी भी प्रकार से, कुतूहल मात्र से भी स्वयं को स्वतंत्र जानने की इच्छा करके साल दो साल को ? नहीं । एक दो माह को ? नहीं । सप्ताह दो सप्ताह को? नहीं । दिन दो को? नहीं मात्र एक मुहर्त को(४८ मि.)लिए ही सही भाग्य से स्वाधीन हो जा । तथा भाग्य से भिन्न जिसका विलास है ऐसे अपनी प्रात्मा को देखकर उसका तद्रप में अनुभव कर। ऐसा करने पर भाग्य के साथ जो तेरे एकत्व पने का विश्वास उसको तु शीघ्र ही छोड़ देगा। .
अनेकान्त रूपी अस्त्र के द्वारा परम पुरुषार्थी ने सर्वग्रासी भाग्य से जिस किस सरह मुक्ति दिलाकर यह घोषणा की थी कि जीव भाग्य से पृथक् है स्वतन्त्र है । परन्तु जिस पक्षी की चिरकाल से पिंजरे में परतंत्र रहने के कारण सहज उड़ने की शक्ति कुंठित हो गई है, उस पिंजरे से बाहर भी निकाल दीजिये तो वह पिंजरे की ओर ही झपटता है । इसी तरह यह जीव अनादि से परतंत्र होने के कारण अपने मूल स्वातंत्र्य पुरुषार्थ को भूला हा है और भय से भयभीत होकर कभी काललब्धि का, कभी नियती का नहीं तो कभी स्वभाव प्रादि का शारखागत होने के लिये उद्विग्न प्रातुर हो उठता है और अनेकान्तमयी पुरुषार्थ को करने के लिये प्रालसी होकर अनेकान्त को. दूधरण देता है और 'अनेकान्त' को भी अपनी पराधीनता की वृद्धि करने के लिये 'एकान्त' बना लेता है।
प्राग्रही बात निनीषति युक्ति तत्र यत्र मतिरस्य निविष्टा । .. पक्षपात रहितस्य तु युक्ति यंत्र तत्र मतिरेति निवेशम् ॥२१४६०
- एकान्ती (दुराग्रही) मनुष्य ने जो पक्ष निश्चित कर रखा है, वह युक्ति को उसी और ले जाना चाहता है। किन्तु जो अनेकान्ती (अदुराग्रही) निष्पक्ष दृष्टि से