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________________ अध्याय : ग्यारहवां ] तं तव तfम्म देसे लेख विहाणेण तम्मि कालस्मि । - को सक्क वाले इदो वा ग्रह जिरिंदो या ।।२१५८ ॥ जिस जीव का जिस देश और जिस काल में जिस विधि से जन्म अथवा नियत जाना है । उसका मरण ( उपलक्ष से अन्यान्य समस्त कार्य) जिनेन्द्र देव ने उस देश और उस काल में जन्म अथवा मरण उस विधि से इन्द्र हो अथवा स्वयं जिनेन्द्र देव हो उसे चलायमान कौन कर सकता है ? [ १०२१ नियम से होता है । चाहे उस उपादान रूपी स्त्री की उन्ही के प्रांगन में, रात्री समय में मेरा बाह्य व्यवहारीक ज्ञापक निमित्त के उपस्थिति मात्र से व्यभिचार रूप कार्य होना था । उपरोक्त प्रकार होने का सर्वज्ञ ने नियत रूप से जाना था इसको निवारण करने के लिये इन्द्र अथवा स्वयं सर्वज्ञ अनन्त शक्तिवान जिनेन्द्र भी निवारण नहीं कर सकते हैं तो मैं उसको निवारण करने रूप प्रनध्यवसाय का कर्ता होकर कर्म को क्यों बांधता ? यदि यह कार्य हो भी गया तो प्रधीर, पश्चाताप लज्यान्वित क्यों हूंगा ? . जो जो देखी वीतराग ने सो-सो होसी घीरा रे । अनहोनी कहूं हो है नहीं का हूगां प्रधोरा रे ।।२१५६॥ इस प्रकार वीतराग भगवान के ज्ञान पहिले से निश्चित रूप में नियत रूप में क्रमबद्ध पर्याय के अनुसार होने का झलका था, जिससे कि होकर ही रहा । यदि पहिले से नहीं अलका हुआ होता, तो यह घटना नहीं होती । श्रतएव वीतराग भगवान दोषी हैं, मैं प्रमेकान्ती हूँ, मेरा जीवन ही अनेकान्त मय है । वर्तमान उपादान के ऊपर विचार करिये । व्यभिचार रूप क्रिया का कार्य उस स्त्री में हुआ । अतः वह स्त्री हुई उपादान “उपादान के कार्य के समय में निमित्त स्वयमेव उपस्थित होता हो है, "इस सिद्धान्त के अनुसार उस अन्धकारमयी रात्रि के दो बजे के समय उस स्त्री की उपादान कार्य को ज्ञापक निमित्त होने को कोई न कोई पुरुष को उपस्थित होने का कष्ट करना पड़ता था और बाद में बतमान मेरी जो दशा है, इसी प्रकार होता । यह सब नहीं हो इसलिए मैं कष्ट करके ज्ञापक निमित्त रूप से उपस्थित हो गया था और यह सब उपादान के योग्यता के अनुसार ही हुआ। जिस प्रकार उपादान रूपी मिट्टी का घड़ा रूप बनने की योग्यता होती है तब कुम्हार कुदाल, चाक आदि ज्ञापक उदासीन निमित्त उपस्थित हो ही जाता है और मिट्टी हो उस घट का ====
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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