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________________ अध्याय : नौवां ] [ ७६७ २. ये सब ही नारायण अधोगामी अर्थात् 'रत्नप्रभा आदि भूमियों में जाने वाले ३. इन पर सदाकाल १६. चमर ढुरते रहते हैं। ४. इनके सात प्रकार के प्रायुध अर्थात महारत्म होते हैं (१) सुनन्दक का नाम का खड्ग (२) पांचजन्य नाम का शंख । (३) शाङ्ग नाम का धनुष (४) सुदर्शन नाम का चक्र (५) कौस्तुभ नाम का मरिण (६) अमोघा नाम की शक्ति । (७) कौमुदी नाम की गदा होती है । ५. राजा शिशुपाल ने कृष्ण नाम के नारायण को रुक्मिणी का हरण करते समय एक सौ गालियां दी। तदन्तर कृष्ण ने उनको मारा । इस प्रकार हरिवंश पुराण में वर्णन आया है । ६, 'त्रिपिष्ट' नाम का पहला नारायण (हरि) का जीव 'वर्धमान' तीर्थीकर होकर __ मुक्त हुआ है । इस प्रकार उतर पुराण पर्व ७४ में लिखा है। ७. 'लक्ष्मण नाम का ८ वां नारायण (हरि) का जीध पुष्करार्द्ध द्वीप के विदेह क्षेत्र में जन्म लेने वाला है। इस प्रकार पद्मपुरागर पर्व १०६ में लिखा है । ८, कोटिशिला या कोटिकशिला पाठ योजन लम्बी चौडी और एक योजन ऊँची होती है । इसको सिद्ध शिला भी कहते हैं--- नाभिगिरिशिरोदेशे शिला योजनमुत्थिता। . अष्टयोजनविस्तीरसिध्वस्थानं मुनीशिनाम् ॥ इस कोटि शिला को हर एक नारायण (हरि) अपनी भुमाओं से उठाते हैं। कौन नारायण ने कहां तक उठाई थी उसका वर्णन(१) विपृष्ट महापुरुष ने वह शिला मस्तक के ऊपर जहां तक कि भुजा पहुँचती है, वहां तक उठायी थी। (२) द्विपृष्ट , वह शिला मस्तक तफ उठाई थी। (३) स्वयंभू कंठ तक , (४) पुरुषोत्तम , .. .... - वक्षस्थल तक ॥ (५) पुरुषसिंह , हृदय तक ........ (६) पुंडरीक , कमर तक ,
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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