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________________ २५२ ] [ गो, प्र. चिन्तामणि वह्नि बीज समानान्तं पर्यन्ते स्वस्तिकाभितम् । ऊर्ध्व वायु पुरोद्भत निर्द्ध में काञ्चन प्रभम् ॥४३५।। अन्तर्दहति मन्त्राविहिर्वह्निपुरं . पुरम् । धगद्ध' गिति विस्फूर्जज्ज्वालाप्रचय भासुरम् ॥४३६।। भस्म भाव मसौ नील्वा शरीरं तच्च पङ्कजम् ।। दाह्याभावात्स्वयं शान्ति याति वह्निः शनैः शनैः ॥४३७।। उस कमल के दग्ध हुए पश्चात् शरीर के बाह्य त्रिकोण वह्नि (अग्नि) का . .. चिन्तवन करे, मो ज्वाला के समूहों से जलते हुए बडवानल के समान ध्यान करे। . तथा अग्नि बीजाक्षर 'र' से व्याप्त और अन्त में साथिया के चिह्न से चिह्नित हो, ऊर्ध्व वायुमंडल से उत्पन्न धूम रहित कांचन की सी प्रभा वाला चितवन करे । इस प्रकार यह धगधगायमान फैलती हुई लपटों के समूह से देदीप्यमान बाहर का अग्निपुर (अग्निमंडल) अंतरंग की मंत्राग्नि को दग्ध करता है । तत्पश्चात् वह अग्निमंडल उस नाभिस्थ कमल और शरीर को भस्मीभूत करके दाह्य (जलाने योग्य पदार्थ) का अभाव होने से धीरे-धीरे अपने आप यह अग्नि शान्त हो जाती है । चित्र नं० ७०-८-६ देखे । मारुती धारण का स्वरूप विमानपथ मापूर्ण संघरन्तं समीरणम् । स्मरत्यविरतं योगी महावेगगं महाबलम् ॥३४८॥ योग (ध्यान करने वाल मुनि) अाकाश में पूर्ण हो कर विचरते हुए महा. वेग वाले और महाबलवान ऐसे वायुमंडल का चिन्तवन करें । चालयन्तं सुरानोकं ध्वनन्तं निदशाचलम् । दारयन्तं धनवातं क्षोभयन्तं महागवम् ॥४३६।। व्रजन्तं भुवना भोगे संचरन्तं हरिन्मुखे । विसर्पन्तं जगन्नोडे निविशन्तं धरातले ॥४४०।। ... उध्य तद्रजः शीघ्र तेन प्रबल वायुना । ततः स्थिरी कृताभ्यासः समीर शांति मानयेत्।।४४१।। तत्पश्चात् उस पवन को ऐसा चिन्तवन करे कि देवों की सेना को चलायमान करता है, मेरु पर्वत को पाता है, मेघों के समूह को बिखेरता हुआ, समुद्र को मोम Paintend
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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