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अध्याय : पांचवां ]
उस महामन्त्र का स्वरूप
रेफरूद्धं कलाविद् लाब्धितं शून्यमक्षरम् 1 लसादिन्दुच्छ कोटि कान्ति व्याप्त हरिन्मुखम् ||४३०||
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रेफ से रूद्ध कहिले ग्रावृंतर त्या विन्दु से चिह्नित और शून्य कहिये हकार ऐसा अक्षर लसत् देदीप्यमान होते हुए इंदु की छटा कोटि को कान्ति से व्याप्त किया है दिशा का मुख जिसने ऐसा महामन्त्र "हे" उस कमल की कणिका में स्थापन कर, चित्तवन करे । चित्र नं० ४ ।
फिर कैसा चिन्तयन करें-
तस्य रेफाद्विनिर्यान्तीं शनं धूम शिखां स्मरेत् । स्फुलिङ्ग संतति पश्चाज्ज्वालालों तदनन्तरम् ॥४३१॥ तेन ज्वाला कलापेन बर्द्धमानेन सन्ततम् । दत्यविरतं धरिः पुण्डरीकं हृदि स्थितम् ||४३२ ॥
( धुआँ ) की
तत्पश्चात् उस महामन्त्र के रेफ से मंद-मंद निकलती हुई धुम शिखा का चिन्तन करे तत्पश्चात् उसमें से ग्रनुक्रम से प्रवाह रूप निकलते हुए स्फुलिंगों की पंक्ति का चिन्तन करे और तत्पश्चात् उसमें से निकलती हुई ज्वाला की लपटों को विचारे । तत्पश्चात् भोगी मुनि क्रम से बढ़ते हुए ज्वाला के समुह् से अपने हृदयस्थ कमल को निरन्तर जलाता हुआ चिन्तवन करे । हृदय कमल का विशेष स्वरूप
तदष्ट कर्म निर्माणमष्ट पत्र मधोमुखम् ।
हत्येव महामन्त्र ध्यानोत्य प्रबलोऽनलः ॥४३३॥
वह हृदयस्थ कमल वो मुख आठ पत्र का (पाखडीवाल) है; उन आठ पत्रों (बलों) पर आठ कर्म स्थित हों, ऐसे कमल को नाभिस्थ कमल की कणिका में स्थित "ई" महामन्त्र के ध्यान से उठी हुई प्रबल अग्नि निरंतर दहती है; इस प्रकार चिन्तयन करें, तब प्रष्ट कर्म जल जाते हैं, यह चैतन्य परिणामों को सामर्थ्य है |
चित्र नं० ५-६ १
ततो बहिः शरीरस्य त्रिकोणं वह्निमण्डलम् ।
स्मरेज्ज्वाला कलापेन ज्वलन्तमिव वाडवम् ॥ ४३४ ॥
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