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________________ अध्याय : आठवां ] [ ६२६ बहुश्रुतभक्ति, प्रवचनभक्ति, मार्ग प्रभावना, प्रवचन वत्सलत्व सदृश सद्गुणों का सद्भाव स्वीकार करने में क्या बाधा आती है ? ये तो भावनाएं सम्यक्त्व की पोषिकाएं हैं । क्षायिक सम्यक्त्वी के पास उनका अभाव होगा ऐसा सोचना तक कठिन प्रतीत होता है । अतएव दर्शन विशुद्धि की विशेष प्रधानता को लक्ष्य में रखकर उसे कारणों में मुख्य माना गया है। इस विवेचन के प्रकाश में प्रतीयमान विरोध का निराकरण करना उचित है। विशेष-सम्यग्दर्शन और दर्शन बिशुद्धि भावना में भिन्नता है । सम्यग्दर्शन प्रात्मा का विशेष परिणाम है । वह बन्ध का कारण नहीं हो सकता । उसके सद्भाव में एक लोक कल्याण की विशिष्ट भावना उत्पन्न होती है, उसे दर्शन विशुद्धि भावना कहते हैं । यदि दोनों में अन्तर न हो, तो मलिनता आदि विकारों से पूर्णतया उन्मुख सभी क्षायिक सम्यक्त्वी तीर्थकर प्रकृति के बन्धक हो जाते; किन्तु ऐसा नहीं होता, अतः यह मानना तर्क संगत है कि सम्यक्त्व के साथ में और भी विशेष पुण्य भावना का सदभाव आवश्यक है। मागम में गाया है कि सानो सम्पपरों में तीर प्रकृति का बन्ध हो सकता है, अतः यह मानना उचित है कि सम्यक्त्व रूप आत्मनिधि के स्वामी होते हुए भी विशुद्ध भावना का सद्भाव आवश्यक है। उसके बिना क्षायिक सम्यक्त्वी भी तीर्थङ्कर प्रकृति का बन्ध नहीं कर सकेगा। क्षायिक सम्यक्त्व मात्र यदि तीर्थङ्कर प्रकृति का कारण होता तो सिद्ध पदवी की प्राप्ति के पूर्व सभी केवली तीर्थङ्कर होते; क्योंकि केवल ज्ञानी बनने के पूर्व क्षपक श्रेणी प्रारोहण करते समय क्षायिक सम्यक्वी होना अनिवार्य नियम है। भरत क्षेत्र में एक अवसर्पिणी में चौबीस ही तीर्थकर हुए हैं। इतनी अल्पसंख्या ही तीर्थंकर प्रकृति की लोकोत्तरता को स्पष्ट करती है। क्षायिक सम्यक्त्वी होने मात्र से यदि तीर्थंकर पदवी प्राप्त होती तो महावीर तीर्थकर के समवशरण में विद्यमान ७०० केवली सामान्य केवली न होकर तीर्थंकर केवली हो जाते, किन्तु ऐसा नहीं होता । एक तीर्थकर के समवशरण में दूसरे तीर्थकर का सद्भाव नहीं होता । एक स्थान पर एक ही समय दो सूर्य या दो चन्द्र प्रकाशित नहीं होते, उसी प्रकार दो तीर्थकर एक साथ नहीं पाए जाते हैं । हरिवंश पुराण में कहा है--- नाग्योन्यदर्शन जातु चकियां धर्मवकिरणाम् । हलिनां बासुदेवानां त्रैलोक्य प्रतिक्रिरणाम् ॥१५४४।।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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