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[ मो. प्र. चिन्तामरिए अनुभाग पड़ता है । इस सम्बन्ध में यह बाल भी ध्यान में रखना उचित है कि तीर्थङ्कर प्रकृति के बन्ध रूप बीज बोने का कार्य केवली श्रुत केवली के पादमूल अर्थात् चरणों के समीप होता है । भरत क्षेत्र में इस काल में अब उक्त साधन युगल का प्रभाव होने से तीर्थकर प्रकुति का बन्ध नहीं हो सकता है।
प्रश्न-मावना के लिये केवली के चरणों की समीपता का क्या कारण है ?
उत्तर-इस प्रकार का उत्तर यह होगा कि उन जिनेन्द्र की दिव्यवारणी के प्रसाद से देव, मनुष्य, पशु सभी जीवों को धर्म का अपूर्व लाभ होता है । यह देखकर किसी महाभाग के हृदय में ऐसे अत्यन्त पवित्र भाव उत्पन्न होते हैं कि मिथ्यात्वरूप महा अटवी में भोह की दावाग्नि जलने से अगणित जीव मर रहे हैं, उनके अनुग्रह करने की प्रभो! आपके समान क्षमता, शक्ति तथा सामर्थ्य-मेरी भी आत्मा में उत्पन्न हो, जिससे में सम्पूर्ण जीवों को आत्मज्ञान का अमृत पिलाकर उनको सच्चा सुख मार्ग बता सकू। इस प्रकार की विश्वकल्याण की भावना के द्वारा सम्यक्त्वी जीव तीर्थङ्कर प्रकृति का बन्ध करता है।
विनयसंपन्नता, अर्हत भक्ति, प्राचार्य भक्ति, प्रवचन भवित, मार्ग प्रभावना, प्रवचनवत्सलत्व सदृश अनेक भावनाएं सम्यक्त्व के होने पर सहज ही उसके अंगरूप में प्राप्त हो जाती हैं । जिस प्रकार अक्षर हीन मंत्र विषवेदना को दूर नहीं कर सकता है। ऐसी स्थिति में सम्यक्त्व यदि सांगोपांग हो तथा उसके साथ सर्व जीवों को सम्यक ज्ञानामृत पिलाने की भावना या मंगल कामना प्रबल रूप से हो जाय तो तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध हो सकता है । दर्शन विशुद्धि भावना परिपूर्ण होने पर अनेक भावनाओं के निरुपण को गोरा बनाकर कथन किया जाय तो तीर्थंकर पद में कारण दर्शन विशुद्धि को भी (मुख्य मानकर) कहा जा सकता है।
इस प्रसंग में पहले महामंडेलश्वर राजा श्रेणिक का उदाहरणा पा चुका है। श्रेणिक महाराज अवती थे, क्योंकि वे नरकायु का बन्ध कर चुके थे । वे क्षायिक सम्यक्त्वो थे । उनके दर्शन विशुद्धि की भावना थी, यह कथन भी ऊपर आ चुका है। महावीर भगवान का सानिध्य होने से केवली का पादमूल भी उनको प्राप्त हो चुका था। उनमें शक्तितस्त्याग, शक्तिस्तप, आवश्यकापरिहाणि, शीलवतों में निरतिचारता सदृश संयमी जीवन से सम्बन्धित भावनाओं को स्वीकार करने में कठिनता आती है, किन्तु अर्हत भक्ति, गगधरादि महान गुरुओं को श्रेष्ठ सत्संग रहने से प्राचार्य भक्ति,
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