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________________ अध्याय : ग्राउवा ] __ [ ६२७ रहाप्रभां प्रविष्ट: संस्तत्फलं मध्यमायुषा । भुक्त्वानिर्गल्य भव्यास्मिन् महापाख्य-तीर्थकृत ॥१५४०॥ इस विषय में तत्वार्थ श्लोकवातिकालकार का यह कथन ध्यान देने योग्य है। विद्यानन्दि स्वामी कहते हैं : दग्विशुध्यायो नाम्नस्तीर्थंकृत्वस्य हेतयः । समस्ता व्यस्तरूपा वा दुग्विशुध्या समन्विताः ॥१५४१॥ दर्शनविशुद्धि आदि तीर्थंकर नाम कर्म के कारण हैं, चाहे भे सभी कारण हों या पृथक-पृथक हों किन्तु उनको दशनविशुद्धि समन्वित होना चाहिए। इसके एश्चात् तीर्थंकर प्रकृति के विषय में बड़े गौरव पूर्ण शब्द कहते हैं : सर्वातिशायि तत्पुण्या त्रैलोक्याधिपतित्वकृत् ।।१५४२५॥ वह पुण्य तीन लोक का अधिपति बनाता है । वह पुण्य सर्व श्रेष्ठ है। दर्शनविशुद्धि प्रादि भावनाएँ पृथक् रूप में तथा समुदाय रूप में जीर्थकर पद की प्राप्ति में कारण हैं, ऐसा भी अनेक स्थलों में उल्लेख आता है । हरिवंश पुराण में कहा है :-- तीर्थकर नामकर्मारिप षोडश तत्कारणायमूनि । व्यस्तानि समस्तानि भवति सद्भाव्य मानानि ॥१५४३।। प्रकलंक स्वामी राजवातिक में लिखते हैं : तान्येतानि षोडशकारणानि सम्यग् भाव्यमानानि व्यस्तानि समस्तानि च तीर्थकर कामकर्मणः तत्र कारणानि प्रत्येतव्यानि । (सूत्र २४ पृ० २६७) इन भावनाओं में दर्शनविशुद्धि का स्वरूप विचार करने पर उसकी मुख्यता स्पष्ट रूप से प्रतिभासमान होती है। तीर्थकर प्रकृति रूप धर्म कल्प तरु पूर्ण विकसित होकर रत्नत्रय के फलों से समलंकृत होते हुये पुण्य रूपी पुष्पोंसे अगणित भव्यों की अवर्णनीय आनन्द तथा शांति प्रदान करता है, उस कल्पतरु की बीजरूपता का स्पष्ट रूप से दर्शन प्रथम भावना से होता है । दर्शन विशुद्धि में प्रागत दर्शन शब्द सभ्यर्शन का वाचक है, इसी कारण यह अागम बावय है 'सम्मेवे तित्थ बन्धों' - तीर्थङ्कर प्रकृति का बन्ध सम्यकत्व होने पर ही होता है । विशुद्धि का भाव है पुण्य प्रद. उज्जवल भाव, जिसका संवलेश की कालिमा से तनिक भी सम्बन्ध न हो । कारण विशुद्ध भाव से शुभ प्रकृतियों में तीन
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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