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[ गा. प्र. चिन्तामखि
प्रश्न :- तीर्थंकर नाम कर्म के सोलह कारणों में दर्शन विशुद्धि भावना की प्रमुखता क्यों है ?
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उत्तर :---पं० श्राशावर जी ने सागर धर्मामृत ( ८-७३ ) में लिखा है कि केवल दर्शन विशुद्ध भावना से ही श्रेणिक नरेश ने तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया है । संस्कृत टीका में उपरोक्त कथन का समर्थन करते हुये ये शब्द लिखे गये हैं। 'एकया असहायया विनयसंपन्नतादितीर्थंकरत्वकारणान्तररहितया दृग्विशुध्या श्रेणिको नाम मगधमंडलेश्वरस्तीर्थकृत् धर्मतीवरों भविता भविष्यति' । अर्थात् विनय संपन्नतादि तीर्थंकरत्व के कारणांतरों से रहित केवल एक दर्शन विशुद्धि के द्वारा श्रेणिक नामक मगध महा मंडलेश्वर धर्मतीर्थकर होंगे ।
शंका :--- उत्तर पुराण के प्रकृत प्रसंग पर प्रकाश डालने वाली एक भिन दृष्टि पाई जाती है | वहां पर्व ७४ में श्रेणिक राजा ने गवर देव से पूछा है कि मेरी जैनधर्म में बड़ी भारी श्रद्धा प्रगट हुई है तथापि मैं व्रतों को क्यों नहीं ग्रहण कर सकता है ? समाधान :- उत्तर देते हुए गणधर देव ने कहा तुमने नरकायु का बंध किया है ? यह नियम है कि देवायु के बन्ध को छोड़कर अन्य आयु का बन्ध करने वाला फिर व्रतों को स्वीकार नहीं कर सकता। इसी कारण तुम व्रत धारण नहीं कर सकते । हे महाभाग ! श्राज्ञा, मार्ग, बोज श्रादि दस प्रकार की श्रद्धाओं में से आज तुम्हारे कितनी ही श्रद्धाएँ विद्यमान हैं । इनके सिवाय दर्शनविशुद्धि आदि शास्त्रों में कहे हुए जो शुद्ध सोलह कारण हैं, उनमें से सब या कुछ कारणों से यह भव्य जीव तीर्थंकर नाम कर्म का बन्ध करता है। इनमें से दर्शनविशुद्धि आदि कितने ही कारणों तू तीर्थकर नाम कर्म का बन्ध करेगा । मरकर रत्नप्रभा नरक में जायेगा और वहाँ से आकर उत्सर्पिणी काल में 'महापद्म' नाम का प्रथम तीर्थंकर होगा । ग्रन्थकार के शब्द इस प्रकार हैं
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एतास्वपि महाभाग तव संस्कार | दर्शनाद्यागम प्रोक्तशुद्ध पोडशकारः ॥१४३ भव्योव्यस्तः समस्तैश्च नामात्मीकुरुते सम । तेषु श्रद्धादिभिः कैश्विदुबध्या तनामकारणैः ॥ १५३६॥