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श्रध्याय: श्राठai ]
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है । उसमें सोलह भावनाओं का भाया जाना सम्भव नहीं है । अतः उसमें तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध नहीं होगा ।
यह भी बात स्मरण योग्य है कि इसका बंध मनुष्य गति में ही केवली प्रथा तवली के चरणों के समीप प्रारम्भ होता है । 'तित्थयरबंधपारंभयाणरा heegi | ( ६३ कर्मकांड मो० ) इस प्रकृति का बंध तिर्यञ्चगति को छोड़ शेष तीन गतियों में होता है । इसका उत्कृष्टपने से अन्तर्मुहूर्त अधिक आठ वर्ष न्यून दो कोटि पूर्व अधिक तैंतीस सामर प्रमाण काल पर्यन्त बंध होता है । केवली श्रुत केवली का सानिध्य इससे आवश्यक कहा है कि 'तदन्यत्र तादृग्विशुद्धि विशेषासंभवात्' उनके सानिध्य के सिवाय वैसी विशुद्धता का अन्यत्र प्रभाव है ।
नरक की प्रथम पृथ्वी में तीर्थंकर प्रकृति का बंध पर्याप्त तथा पर्याप्त श्रवस्था में होता है । दूसरी तथा तीसरी पृथ्वी में पर्याप्त अवस्था में ही इसका बंध होता है । आगे के नरकों में इस प्रकृति का बंध नहीं होता है । कहा भी है
श्रमतित्यं बंध वंसा मेधारा पुष्णगो चेव । १०६ गो० कर्म० । गोमट्टसार कर्म कांड माथा १३६ में लिखा है कि तीर्थकर प्रकृति का उत्कृष्ट स्थिति बंघ अविरत सम्पदृष्टि के होता है ।
तित्यरं च मस्सो प्रविरदसम्म समज्जेइ । इसकी संस्कृत टीका में लिखा है— 'तीर्थकर उत्कृष्ट स्थितिकं नरकगतिगमनाभिमुख – मनुष्यासंयम सम्यग्दृष्टिरेव astra' ( बड़ी टीका पृष्ठ १३४) उत्कृष्ट स्थिति सहित तीर्थंकर प्रकृति को नरकगति जाने के उन्मुख असंयत सम्यक्त्वी मनुष्य बांधता है, कारण उसके तीव्र संक्लेश भाव रहता है । उत्कृष्ट स्थिति बंध के लिये तीव्र संक्लेश युक्त परिणाम आवश्यक है । नरकगति में गमन के उन्मुख को तीव्र संक्लेश के कारण तीर्थंकर रूप शुभ प्रकृति का अल्प अनुभाग बंध होगा क्योंकि 'सुहपयडी विसोही प्रसुहारा संकिलेसेस ति० लो० (१६३) शुभ प्रकृतियों का तीव्र अनुभाग बंध विशुद्ध भावों से होता है । तथा
शुभ प्रकृतियों का तीव्र अनुभाग बंध संक्लेश से होता है, तीर्थंकर प्रकृति का बंध अपूर्वकरण गुणस्थान के छठवें भाग पर्यन्त होता है, श्रतएव इस गुणस्थानवर्ती मुमिराज के उत्कृष्ट अनुभाग बंध होगा । स्थिति बन्ध का स्वरूप विपरीत होगा अर्थात् वह न्यून होगा ।
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