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[ गो. प्र. चिन्तामणि चक्रवर्ती, धर्मचक्रवती, वासुदेव, प्रतिवासुदेव तथा बलदेव इनका और अन्य चक्रवर्ती, धर्म चक्रवर्ती, वासुदेव, प्रतिकासुदेव तथा बलदेव का क्रमशः परस्पर दर्शन नहीं होता है।
प्रश्न---तीर्थजुर प्रकृति को विशेषता क्या है ?
उत्तर--तीर्थकर प्रकृति के सद्भाव की विशेषता-तीर्थकर प्रकृति का उदय केबली अवस्था में होता है | तित्थं केवलिरिण-यह पागम का वाक्य है । यह नियम होते हुए तीर्थंकर भगवान के गर्भकल्याणक जन्मक ल्यारक तथा तपकल्याण के रूप कल्याएकमय तीर्थकर प्रकृति के सद्भाव मात्र से होते हैं । होनहार तीर्थंकर के गर्भकल्याराहक के छह माह पूर्व ही विशेष प्रभाव दृष्टिगोचर होने लगता है । भरत तथा ऐरावत क्षेत्र में पंचकल्याणक वाले ही तीर्थकर होते हैं। देवगति से चयकर पाते हैं या नरक से पाकर मनुष्य पदवी प्राप्त करते हैं। तिर्यञ्च पर्याय से पाकर तीर्थकर रूप से जन्म नहीं होता है । तिर्यञ्चों में तीर्थकर प्रकृति के सत्व का निषेध है । 'तिरियेगा तित्थसत्तं तं' यह वाक्य गोरकर्मयागा है। पनकल्याणक वाल तीर्शकर मनुष्य पर्याय से भी नहीं पाते । वे नरक देवगति से प्राते हैं । अपनी पर्याय परित्याग के छः माह शेष रहने पर नरक में देव जाकर होनहार तीर्थीकर के असुरादि कृत उपसर्ग का निवारण करते हैं । स्वर्ग से. पाने वाले देव के छह माह पूर्व माला नहीं मुरझात्ती हैं । त्रिलोक सार में कहा है--
. तित्थयर. संतकम्मुवसग्गं खिरए सिधारयतिसुरा।
छम्मासाउगसेसे सग्गे अमलास-मालंका ॥१५४५॥ तीर्थङ्कर सत्कर्मोपिसम नरके निकायंनि सुराः ।
प्रमासायुकशेधे स्वः नरके मालाकाः ॥१४४६।। . इस अवसपिणी काल में सभी तीर्थ कर स्वर्ग से चयकर इस भरत क्षेत्र में पाये थे । जब स्वर्ग चय करने को छह मास शेष रहे तब उस महान आत्मा के प्रति सुरसमुदाय को महान प्रादर भाव उत्पन्न होता था । सबकी दृष्टि भगवान की ओर केन्द्रित हआ करती थी। वर्षमान चरित्र में बताया है कि जिनेन्द्र होने काले उस स्वर्गवासी देव को देवता लोग प्रणाम करने लगते हैं । कगि ने महावीर भगवान् के जीब प्राणतेन्द्र के विषय में जो बात लिखी वह अन्य तीर्थ करों के विषय में भी उपयुक्त दिखती है।